
अपराध की दुनिया भी अब हाईटेक हो चुकी है. गैंगस्टर और शूटर सामान्य कॉल या SMS की जगह प्राइवेसी फीचर्स वाले मैसेजिंग और सोशल मीडिया ऐप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं. अंकित बालियान हत्याकांड की जांच में Snapchat के इस्तेमाल की बात सामने आने के बाद एक बार फिर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए होने वाले अपराध पर सवाल उठे हैं.आज के दौर में अपराधी भी तकनीक का इस्तेमाल तेजी से कर रहे हैं. पुलिस की निगरानी और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) से बचने के लिए कुछ आपराधिक नेटवर्क एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का सहारा लेते हैं. हाल ही में सामने आए हरियाणवी सिंगर और यूट्यूबर अंकित बालियान हत्याकांड में भी डिजिटल कनेक्शन जांच का अहम हिस्सा बना है.जांच में सामने आया कि शूटरों को टारगेट और निर्देश देने के लिए Snapchat का इस्तेमाल किया गया. बताया गया कि वारदात से पहले रेकी और साजिश से जुड़े संवाद के लिए भी डिजिटल प्लेटफॉर्म का सहारा लिया गया. मामले की कड़ियां कनाडा में बैठे गैंगस्टरों से जुड़ने की बात भी सामने आई है.
Snapchat अपने disappearing messages फीचर के लिए जाना जाता है. इसमें भेजी गई कुछ सामग्री तय समय के बाद गायब हो सकती है. इसी वजह से अपराधी यह मान सकते हैं कि बातचीत का स्थायी रिकॉर्ड नहीं रहेगा. अंकित बालियान केस में भी इसी प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल की बात जांच में सामने आई है.
Signal एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन के लिए जाना जाता है. इसका उद्देश्य यूजर्स की बातचीत को सुरक्षित रखना है. ऐसे फीचर्स की वजह से कुछ आपराधिक नेटवर्क विदेश में बैठे लोगों और स्थानीय संपर्कों के बीच संवाद के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं.
Zangi एक मैसेजिंग और इंटरनेट कॉलिंग प्लेटफॉर्म है. जांच एजेंसियों के सामने ऐसे मामलों में इसका नाम भी आया है, जहां अपराधी अपने नेटवर्क में नए लोगों से संपर्क करने या उन्हें निर्देश देने के लिए प्राइवेट कम्युनिकेशन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं.
Telegram आम यूजर्स के बीच भी बेहद लोकप्रिय है. इसमें ग्रुप, चैनल और अलग-अलग प्राइवेसी फीचर्स मौजूद हैं. इन्हीं सुविधाओं का गलत इस्तेमाल करते हुए कुछ आपराधिक नेटवर्क बड़े समूहों तक संदेश या निर्देश पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं.
कई बार अपराधी सीधे किसी व्यक्ति से किसी एन्क्रिप्टेड ऐप पर संपर्क नहीं करते. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे Instagram पर प्रोफाइल, पोस्ट या रील्स के जरिए पहले संपर्क बनाया जा सकता है. इसके बाद बातचीत को दूसरे प्राइवेट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर ले जाने की कोशिश की जाती है.
ऐसा मानना सही नहीं है कि एन्क्रिप्टेड ऐप इस्तेमाल करने के बाद किसी व्यक्ति तक पुलिस नहीं पहुंच सकती. एन्क्रिप्शन मुख्य रूप से संचार को सुरक्षित रखने की तकनीक है, लेकिन जांच में पुलिस सिर्फ चैट के कंटेंट पर निर्भर नहीं रहती.
किसी मामले की जांच में मोबाइल फोन, उपलब्ध डिजिटल डेटा, डिवाइस से जुड़ी जानकारी, सोशल मीडिया गतिविधियां, CCTV फुटेज और अन्य तकनीकी साक्ष्यों को एक साथ देखा जा सकता है.
अगर जांच के दौरान किसी आरोपी का मोबाइल या दूसरा इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बरामद होता है तो विशेषज्ञ डिजिटल फॉरेंसिक के जरिए उसमें मौजूद या उपलब्ध डेटा की जांच कर सकते हैं. डिलीट हुई सामग्री, स्क्रीनशॉट, बैकअप और दूसरी डिजिटल जानकारी भी जांच का हिस्सा बन सकती है.किसी अपराध में इस्तेमाल हुए ऐप का पता चलना जांच की शुरुआत भर हो सकता है. पुलिस अलग-अलग डिजिटल और भौतिक सबूतों को आपस में जोड़कर पूरी कड़ी समझने की कोशिश करती है.अंकित बालियान हत्याकांड में भी सोशल मीडिया गतिविधियों, CCTV फुटेज, संदिग्धों की लोकेशन और अन्य उपलब्ध सबूतों को जोड़कर जांच आगे बढ़ाए जाने की बात सामने आई है.यानी अपराधी चाहे कितनी भी हाईटेक तकनीक का सहारा लें, डिजिटल दुनिया में पूरी तरह से गायब हो जाना आसान नहीं है. जांच एजेंसियां अलग-अलग स्रोतों से मिले सबूतों को जोड़कर अपराधियों तक पहुंचने की कोशिश करती हैं.


