
10 महीने की जांच में 12 मामलों का जिक्र, डॉक्टरों से लेकर कर्मचारियों तक की भूमिका संदेह के घेरे में; शासन ने KGMU प्रशासन को कार्रवाई के दिए सख्त निर्देश
शादी का झांसा, शोषण और धर्म परिवर्तन का दबाव का खेल उजागर
स्वराज इंडिया ब्यूरो/संजय सक्सेना, लखनऊ।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) से सामने आए कथित धर्मांतरण और महिला उत्पीड़न के मामलों ने चिकित्सा जगत में खलबली मचा दी है। विश्वविद्यालय परिसर में महिला डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और अन्य महिला कर्मचारियों को कथित रूप से प्रेमजाल में फंसाने, शारीरिक एवं मानसिक शोषण करने तथा धर्म परिवर्तन और निकाह के लिए दबाव बनाने के आरोपों की परतें अब खुलने लगी हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की करीब दस महीने चली जांच में 12 प्रकरणों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में कुछ डॉक्टरों, कर्मचारियों और शिकायतों पर कार्रवाई नहीं करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चिकित्सा शिक्षा विभाग ने 30 अक्टूबर को KGMU प्रशासन को पत्र भेजकर STF रिपोर्ट में चिह्नित लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कानूनी एवं विभागीय कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। शासन ने कार्रवाई का विस्तृत ब्यौरा भी तलब किया है। यानी अब विश्वविद्यालय प्रशासन की जवाबदेही तय करने की तैयारी है।
इस पूरे मामले का प्रमुख केंद्र पैथोलॉजी विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. रमीजुद्दीन नायक उर्फ रमीज मलिक से जुड़ा प्रकरण है। एक महिला रेजिडेंट डॉक्टर की शिकायत के मुताबिक, आरोपी ने शादी का भरोसा देकर उसके साथ संबंध बनाए और कथित रूप से उसका शारीरिक एवं मानसिक शोषण किया। पीड़िता ने धर्म परिवर्तन कर निकाह करने के लिए दबाव बनाए जाने के आरोप भी लगाए हैं।
शिकायत के बाद मामला पुलिस तक पहुंचा और आरोपी डॉक्टर के खिलाफ लखनऊ के चौक थाने में मुकदमा दर्ज किया गया। पुलिस ने चार राज्यों में तलाश के बाद उसे लखनऊ के ठाकुरगंज क्षेत्र से गिरफ्तार किया। 9 जनवरी 2026 को हुई गिरफ्तारी के बाद से यह मामला लगातार चर्चा में रहा है। मामले की जांच अभी जारी है और आरोपों पर अंतिम न्यायिक निर्णय आना बाकी है।
पैथोलॉजी से रेडियोलॉजी तक शिकायतों की लंबी फेहरिस्त
STF की जांच में मामला केवल एक डॉक्टर तक सीमित नहीं पाया गया। रिपोर्ट में पैथोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, रेडियोलॉजी और गांधी वार्ड से जुड़े अलग-अलग प्रकरणों का उल्लेख है। इनमें महिला कर्मचारियों के साथ कथित छेड़छाड़, पीछा करने, अनुचित व्यवहार, ब्लैकमेलिंग और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने जैसी शिकायतें शामिल हैं।
माइक्रोबायोलॉजी विभाग में संविदा पर कार्यरत एक महिला कर्मचारी ने वहां के एक कर्मचारी पर छेड़छाड़ करने, पीछा करने और निकाह के लिए दबाव बनाने का आरोप लगाया था। शिकायत के बाद महिला कर्मचारी की संविदा समाप्त किए जाने का मामला भी जांच के दायरे में आया। इसी प्रकार रेडियोलॉजी और गांधी वार्ड से जुड़े कुछ डॉक्टरों तथा नर्सिंग कर्मचारियों के खिलाफ भी महिला सहकर्मियों की शिकायतों का उल्लेख किया गया है।
आरोपियों को संरक्षण देने के आरोप, वरिष्ठों की भूमिका पर भी सवाल
इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू शिकायतों पर विश्वविद्यालय के भीतर हुई कथित कार्रवाई और प्रशासनिक रवैये को लेकर है। STF रिपोर्ट में कुछ वरिष्ठ अधिकारियों और फैकल्टी सदस्यों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि महिला कर्मचारियों की शिकायतों को समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया। कुछ मामलों में शिकायतें दबाने, आरोपितों को संरक्षण देने और पीड़िताओं पर दबाव बनाने की आशंका भी जताई गई है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि शिकायत करने वाली महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों को करियर खराब करने, परीक्षा में नुकसान पहुंचाने और मानसिक रूप से अस्वस्थ साबित करने जैसी कथित धमकियों का सामना करना पड़ा। विश्वविद्यालय की आंतरिक विशाखा समिति की जांच और शिकायतों के निस्तारण में हुई देरी भी जांच के महत्वपूर्ण बिंदु बने हैं।

इस्लामिक मेडिकोज समूह का भी रिपोर्ट में जिक्र
जांच के दौरान कुछ डिजिटल साक्ष्यों और संपर्कों के आधार पर कथित नेटवर्क तथा इस्लामिक मेडिकोज नामक समूह से जुड़े संदर्भ भी सामने आए हैं। STF ने कुछ लोगों के बीच संपर्क और कथित गतिविधियों की पड़ताल की है। हालांकि, किसी संगठन या अन्य व्यक्ति की संलिप्तता को न्यायिक रूप से सिद्ध मानना अभी उचित नहीं होगा। जांच में सामने आए प्रत्येक संपर्क और भूमिका की अलग-अलग पुष्टि आवश्यक है।
STF की रिपोर्ट के आधार पर चिकित्सा शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव आनंद कुमार त्रिपाठी ने 30 अक्टूबर को KGMU के कुलसचिव को पत्र जारी किया। इसमें KGMU अधिनियम, 2002 और विश्वविद्यालय की परिनियमावली, 2011 के तहत संबंधित डॉक्टरों, प्रोफेसरों और कर्मचारियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट शासन को उपलब्ध कराने को कहा गया है। KGMU के प्रवक्ता डॉ. केके सिंह के अनुसार, संस्थान मामले की समीक्षा कर रहा है और शासन के निर्देशों के अनुरूप आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
अब सबसे बड़ा सवाल: अस्पतालों में महिला कर्मचारियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी?
KGMU का यह प्रकरण केवल एक विश्वविद्यालय तक सीमित प्रशासनिक चिंता का विषय नहीं है, बल्कि देश के बड़े चिकित्सा संस्थानों में कार्यरत महिला डॉक्टरों, नर्सों और कर्मचारियों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। अस्पताल और मेडिकल कॉलेज ऐसे संस्थान हैं, जहां मरीजों की सेवा के साथ-साथ कर्मचारियों को भी सुरक्षित और सम्मानजनक कार्यस्थल मिलना चाहिए।
यदि शिकायतों के बावजूद संस्थानों के जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई करने के बजाय मामले दबाने का प्रयास करते हैं, तो यह व्यवस्था की गंभीर विफलता है। अब निगाहें KGMU प्रशासन की कार्रवाई और शासन की अगली पहल पर टिकी हैं। सवाल यह भी है कि क्या इस जांच के बाद संस्थान में जवाबदेही तय होगी और पीड़ित महिलाओं को न्याय मिल सकेगा?


