
स्वराज इंडिया ब्यूरो/दिल्ली / मैरिटल रेप यानी वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान अदालत ने शादी, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून में मौजूद वैवाहिक बलात्कार के अपवाद को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सवाल किया कि क्या शादी का मतलब किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आजादी खत्म हो जाना है?
मामले में सीनियर एडवोकेट करुणा नंदी ने अदालत के सामने तीन मामलों का जिक्र किया। वहीं, सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने एक ऐसे मामले की जानकारी दी, जिसमें पहले ही FIR दर्ज हो चुकी है और उसे रद्द करने की मांग को लेकर याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
सुनवाई के दौरान करुणा नंदी ने बताया कि वह मैरिटल रेप से जुड़े तीन मामलों में पक्ष रख रही हैं। उन्होंने अदालत से एक विशेष मामले को बाकी मामलों से अलग रखने की मांग की। इस पर गोपाल शंकरनारायणन ने बताया कि संबंधित मामले में FIR पहले ही दर्ज हो चुकी है और आरोपी की ओर से उसे रद्द कराने की मांग की गई है। जबकि अन्य याचिकाएं मुख्य रूप से कानून की वैधता और संवैधानिक चुनौतियों से जुड़ी हैं। अदालत ने भी इस अंतर को ध्यान में रखते हुए मामलों की सुनवाई को लेकर आगे की प्रक्रिया तय की।
सुप्रीम कोर्ट ने मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाने की मांग वाली याचिकाओं पर अगले महीने से अंतिम सुनवाई शुरू करने का निर्देश दिया है। जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने मामले को तीन सप्ताह बाद बुधवार और गुरुवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। यह आदेश केंद्र सरकार की ओर से मामले में अपना हलफनामा दाखिल किए जाने के बाद आया है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि शादी होने से महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता खत्म नहीं हो जाती। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मैरिटल रेप के मामले में कानूनी कार्रवाई की संभावना पर विचार करते समय भारतीय न्याय संहिता (BNS) में मौजूद वैवाहिक अपवाद को भी ध्यान में रखना होगा।
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने यह सवाल भी उठाया कि यदि किसी व्यवहार को कानून में एक विशेष तरीके से अपराध के रूप में परिभाषित ही नहीं किया गया है, तो उसके लिए किसी व्यक्ति को किस आधार पर दंडित किया जा सकता है।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह मुख्य रूप से दो अहम कानूनी सवालों पर विचार करेगा। पहला सवाल यह है कि मौजूदा कानून में वैवाहिक बलात्कार के अपवाद के बावजूद क्या किसी व्यक्ति पर इस आधार पर मुकदमा चलाया जा सकता है। दूसरा सवाल यह है कि क्या वैवाहिक बलात्कार से जुड़ा मौजूदा कानूनी अपवाद संवैधानिक रूप से वैध है?
अदालत यह भी देखेगी कि इस अपवाद का दायरा सीमित करने का क्या प्रभाव होगा और क्या न्यायिक व्याख्या के जरिए ऐसे कृत्य को अपराध की श्रेणी में शामिल किया जा सकता है, जिसे मौजूदा कानून ने स्पष्ट रूप से अपराध से बाहर रखा है।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल 49 पन्नों के हलफनामे में मैरिटल रेप को अलग से अपराध बनाने का विरोध किया है। सरकार का कहना है कि पति को पत्नी की सहमति का उल्लंघन करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन विवाह जैसी सामाजिक संस्था के संदर्भ में ऐसे कृत्य को ‘बलात्कार’ की कानूनी श्रेणी में रखना अत्यधिक कठोर और असंगत होगा।
अब सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई में यह तय होना है कि मौजूदा वैवाहिक अपवाद को बरकरार रखा जाए या उसकी संवैधानिक वैधता और सीमा पर कोई नया कानूनी रास्ता निकाला जाए।


