
राहुल गांधी के धरने से लेकर पुणे के कार्यक्रम तक उठे सवाल, संगठन और वैचारिक दिशा पर भी विपक्ष के निशाने
नई दिल्ली। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘वंदे मातरम’ के गायन को लेकर उठे विवाद के बाद कांग्रेस और राहुल गांधी विपक्ष के निशाने पर हैं। आलोचकों का आरोप है कि राष्ट्रगीत से जुड़े विवाद पर सफाई देने के बजाय कांग्रेस नेतृत्व लगातार ऐसे राजनीतिक कार्यक्रमों में व्यस्त है, जिनका उद्देश्य मूल मुद्दे से जनता का ध्यान हटाना और राजनीतिक नैरेटिव तैयार करना प्रतीत होता है।
विवाद के बीच राहुल गांधी संसद मार्ग थाने पहुंचे और एक युवक के कथित रूप से पैलेट गन से घायल होने के मामले में रिपोर्ट दर्ज कराने की मांग को लेकर धरने पर बैठे। आलोचकों ने सवाल उठाया कि जब संबंधित मामले की जांच पहले से न्यायिक प्रक्रिया के तहत चल रही है तो इस मुद्दे को लेकर थाने पर लंबा धरना देने की आवश्यकता क्यों पड़ी। हालांकि, पैलेट गन से घायल होने के आरोप और घटना की परिस्थितियों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
पुणे के कार्यक्रम ने भी खड़े किए सवाल
इसके बाद राहुल गांधी पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शामिल हुए। कार्यक्रम को लेकर भी राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। आलोचकों का कहना है कि छात्रों से जुड़े मुद्दों पर अपेक्षित चर्चा के बजाय मंच का इस्तेमाल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के लिए अधिक हुआ। राहुल गांधी ने अपने संबोधन में मनुस्मृति और महिलाओं की स्थिति का मुद्दा उठाया, जिस पर विरोधियों ने उनकी कथित चयनात्मक वैचारिक दृष्टि पर सवाल खड़े किए।
कार्यक्रम में भीड़ दिखाने के लिए कथित तौर पर पुराने वीडियो के इस्तेमाल का आरोप भी सामने आया। यदि ऐसा हुआ है तो यह कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियों में पेशेवर प्रचार तंत्र की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करता है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
संगठन से लेकर वैचारिक दिशा तक सवाल
राहुल गांधी की राजनीतिक भूमिका को लेकर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक छवि से कहीं आगे संगठनात्मक कमजोरी की है। 2004 के बाद कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व धीरे-धीरे अधिक परिवार-केंद्रित होता गया और राज्यों में मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व के कमजोर होने का आरोप लगातार लगता रहा है। पार्टी के भीतर गुटबाजी, कार्यकर्ताओं से दूरी और चुनाव के दौरान सक्रिय होने की प्रवृत्ति को भी कांग्रेस की कमजोरी के प्रमुख कारणों में गिना जाता है।
इसके विपरीत भाजपा ने लंबे समय में बूथ स्तर तक संगठन का विस्तार किया और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लगातार जनसंपर्क तथा राजनीतिक अभियान को चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाया। कांग्रेस के सामने चुनौती केवल सरकार का विरोध करने की नहीं, बल्कि अपने लिए स्पष्ट वैचारिक दिशा, मजबूत संगठन और विश्वसनीय वैकल्पिक राजनीतिक कार्यक्रम तैयार करने की है।
पीआर से नहीं, जमीन से बनेगा भरोसा
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए बड़े मंच, रैलियां और सामाजिक माध्यमों पर प्रचार तभी प्रभावी होते हैं जब उनका आधार जमीनी संगठन और जनता के साथ निरंतर संवाद हो। कांग्रेस यदि आगामी चुनावों में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है तो उसे केवल तत्काल राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और प्रचार अभियानों के बजाय बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने, स्थानीय नेतृत्व को अधिकार देने और जनता से जुड़े मुद्दों पर निरंतर आंदोलन खड़ा करने की दिशा में काम करना होगा।
वंदे मातरम विवाद से लेकर हालिया राजनीतिक कार्यक्रमों तक उठे सवालों ने कांग्रेस के सामने एक बार फिर वही पुराना प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या पार्टी अपनी राजनीति को केवल मोदी विरोध के इर्द-गिर्द रखेगी या जनता के सामने अपना स्पष्ट और विश्वसनीय वैकल्पिक मॉडल भी प्रस्तुत करेगी? आने वाले चुनावों में इसका जवाब कांग्रेस की राजनीतिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगा।


