Wednesday, September 23, 2026
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पश्चिमी यूपी में इकरा हसन पर सपा का फोकस, इमरान मसूद के सामने क्यों उतारा नया चेहरा?

स्वराज इंडिया ब्यूरो/ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर पश्चिमी यूपी में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सियासी खींचतान तेज होती दिखाई दे रही है। मामला अब केवल सीटों के बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिमी यूपी में मुस्लिम नेतृत्व और राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी दोनों दलों के बीच खींचतान नजर आ रही है। सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और कैराना से सपा सांसद इकरा हसन के हालिया बयानों ने इस चर्चा को और हवा दे दी है। इमरान मसूद लगातार सपा-कांग्रेस गठबंधन में कांग्रेस की हिस्सेदारी और सीटों के जल्द बंटवारे की मांग उठा रहे हैं। उनका कहना है कि गठबंधन को लेकर निर्णय समय रहते होना चाहिए और कांग्रेस अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी से समझौता नहीं करेगी। वहीं, इकरा हसन ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के नेतृत्व का समर्थन करते हुए पार्टी का पक्ष मजबूती से रखा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर गठबंधन टूटता है तो कांग्रेस को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।

सपा की ओर से इकरा हसन को आगे किए जाने के पीछे कई राजनीतिक समीकरण देखे जा रहे हैं। उनकी पहचान केवल एक मुस्लिम महिला सांसद के तौर पर नहीं है, बल्कि वह युवा महिला नेता के रूप में भी अपनी जगह बना चुकी हैं। उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि को गुर्जर समुदाय से भी जोड़ा जाता है। ऐसे में सपा के लिए इकरा हसन की भूमिका केवल मुस्लिम मतदाताओं तक सीमित नहीं मानी जा रही है।

पश्चिमी यूपी में मुस्लिम और गुर्जर सामाजिक समीकरण कई विधानसभा क्षेत्रों में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऐसे में इकरा हसन को सक्रिय करने से सपा मुस्लिम, गुर्जर, पिछड़े और युवा मतदाताओं के बीच व्यापक संदेश देने की कोशिश कर सकती है। हाल ही में इकरा हसन ने कहा था कि वह मुस्लिम, महिला और ओबीसी हैं और उन्हें कई स्तरों पर प्रताड़ना का सामना करना पड़ा है।

सपा में महिला नेतृत्व को लेकर डिंपल यादव पहले से ही एक प्रमुख चेहरा हैं। अब इकरा हसन को भी उनके साथ उभरते हुए युवा महिला नेतृत्व के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि पश्चिमी यूपी में इकरा की सक्रियता के जरिए सपा नई पीढ़ी और महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाने का संदेश देना चाहती है। खास बात यह भी है कि अब तक इकरा हसन किसी बड़े विवाद में नहीं फंसी हैं।

दूसरी ओर, इमरान मसूद पश्चिमी यूपी की राजनीति में लंबे समय से प्रभाव रखने वाले मुस्लिम नेता माने जाते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में सहारनपुर से जीत हासिल करने के बाद कांग्रेस के लिए उनका महत्व और बढ़ा। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले वह सीट बंटवारे को लेकर खुलकर अपनी बात रख रहे हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस को गठबंधन में सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए और चुनावी तैयारियों के लिए सीटों का फैसला पहले ही कर लिया जाना चाहिए।

सपा और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे की चर्चा में 2017 का विधानसभा चुनाव भी लगातार सामने आ रहा है। कांग्रेस 2017 में दोनों दलों के बीच हुए गठबंधन को आधार बनाकर अधिक सीटों की मांग कर रही है। हालांकि उस चुनाव में गठबंधन का परिणाम कांग्रेस की उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा था। अब 2027 के लिए कांग्रेस उसी पुराने अनुभव को बातचीत का आधार बनाना चाहती है, जबकि सपा मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों के आधार पर सीटों का बंटवारा चाहती है।

पश्चिमी यूपी में मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी मौजूदगी कई विधानसभा क्षेत्रों की राजनीति को प्रभावित करती है। सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ और मुरादाबाद मंडल से जुड़े कई इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या महत्वपूर्ण है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने पश्चिमी यूपी में कई महत्वपूर्ण सीटों पर जीत हासिल की थी। सहारनपुर से इमरान मसूद और कैराना से इकरा हसन की जीत भी इसी राजनीतिक बदलाव का हिस्सा रही।

अब विधानसभा चुनाव 2027 में पश्चिमी यूपी में विपक्ष की राजनीति का संदेश किस चेहरे के जरिए आगे बढ़ाया जाएगा, यह अहम सवाल है। कांग्रेस के पास इमरान मसूद हैं, जबकि सपा इकरा हसन को लगातार सक्रिय कर रही है। इकरा के जरिए सपा महिला, मुस्लिम, युवा और ओबीसी मतदाताओं तक अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। उनकी संवाद शैली की भी पार्टी के भीतर चर्चा होती रही है।

हालांकि इकरा हसन को आगे बढ़ाने का मतलब यह नहीं है कि सपा ने अपने पुराने मुस्लिम नेताओं की भूमिका खत्म कर दी है। पार्टी के पास आजम खान का लंबे समय से राजनीतिक प्रभाव रहा है। रामपुर से सांसद मोहिबुल्लाह नदवी भी सपा के प्रमुख मुस्लिम चेहरों में शामिल हैं। वहीं मेरठ और आसपास के क्षेत्रों में शाहिद मंजूर जैसे पुराने नेताओं का संगठनात्मक प्रभाव है। ऐसे में इकरा हसन को आगे बढ़ाने की रणनीति को सपा की ओर से भविष्य के नेतृत्व को तैयार करने की कवायद के तौर पर भी देखा जा रहा है।


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