Thursday, August 27, 2026
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कानपुर नगर आयुक्त कैंप कार्यालय में भ्रष्टाचार का बड़ा काकस हावी !

एक ही सीट पर अरसे से जमे कार्मिकों पर सिंडीकेट चलाने के आरोप, हर फाइल पर ‘चढ़ावे’ के बिना हस्ताक्षर न होने की शिकायत

मुख्यमंत्री योगी की सख्ती के बाद ठेकेदारों पर कार्रवाई, लेकिन निगम के अंदर बैठे कथित ‘सिस्टम’ पर कब गिरेगी गाज?

प्रमुख संवाददाता, स्वराज इंडिया
कानपुर। नगर निगम कानपुर की कार्यप्रणाली और भ्रष्टाचार को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्त नाराजगी के बाद निगम में कार्रवाई का सिलसिला शुरू हुआ। आधा दर्जन से अधिक ठेकेदारों पर मुकदमे दर्ज हुए और उनकी फर्मों को काली सूची में डालने की कार्रवाई भी की गई। लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़ा है कि अगर भ्रष्टाचार था तो केवल ठेकेदार ही जिम्मेदार थे या निगम की फाइलों को आगे बढ़ाने वाला पूरा तंत्र भी इस खेल का हिस्सा था?

स्वराज इंडिया को मिले इनपुट के अनुसार नगर निगम का नगर आयुक्त कैंप कार्यालय लंबे समय से कथित भ्रष्टाचार के एक बड़े केंद्र के रूप में चर्चा में है। आरोप है कि यहां कुछ कार्मिक वर्षों से एक ही सीट और पटलों पर जमे हुए हैं और तबादले या पटल परिवर्तन के बावजूद प्रभाव का ऐसा तंत्र बना हुआ है कि कुछ समय बाद फिर उसी जगह पहुंच जाते हैं। यही वजह है कि कर्मचारियों के बीच इसे एक तरह के ‘सिंडीकेट’ के रूप में देखा जा रहा है।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि महत्वपूर्ण फाइलों को आगे बढ़ाने से लेकर अधिकारियों के हस्ताक्षर तक की प्रक्रिया में कथित रूप से ‘चढ़ावे’ का खेल चलता है। यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच हो और पिछले कई वर्षों की फाइलों, स्वीकृतियों, भुगतान तथा संबंधित कर्मचारियों की संपत्तियों की जांच की जाए तो तस्वीर कहीं ज्यादा बड़ी सामने आ सकती है।
नगर निगम में लंबे समय से एक ही पटल पर जमे कर्मचारियों को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। आरोप है कि कुछ कार्मिकों के नाम सार्वजनिक रूप से चर्चा में आने और उन्हें हटाए जाने के बाद भी कुछ ही समय में वे फिर प्रभावशाली पटलों पर दिखाई देने लगे। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या नगर निगम में पटल बदलते हैं या केवल नाम?
तत्कालीन नगर आयुक्त सुधीर कुमार के कार्यकाल में भी कैंप कार्यालय की कार्यप्रणाली और कथित भ्रष्टाचार को लेकर सवाल उठाए गए थे। उस समय मुख्यमंत्री कार्यालय स्तर से भी पूछताछ होने की बात सामने आई थी, लेकिन नगर आयुक्त के स्थानांतरण के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। अब एक बार फिर वही सवाल नए सिरे से उठ रहे हैं।

कर्मचारियों की ‘शाही जिंदगी’ भी जांच के घेरे में!

कैंप कार्यालय से जुड़े कुछ कार्मिकों को लेकर यह भी आरोप हैं कि उनकी जीवनशैली उनकी ज्ञात आय से कहीं अधिक आलीशान है। नगर निगम के बंगलों में रहने से लेकर कथित तौर पर बड़ी संपत्तियां अर्जित करने तक की चर्चाएं निगम के गलियारों में हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि शासन या किसी स्वतंत्र एजेंसी की ओर से आय से अधिक संपत्ति, संपत्ति खरीद, बैंक खातों और परिवार के नाम दर्ज परिसंपत्तियों की जांच कराई जाए तो कई परतें खुल सकती हैं। यही वह बिंदु है जहां जांच का दायरा केवल ठेकेदारों तक सीमित रखने के बजाय निगम के उन कर्मचारियों और अधिकारियों तक पहुंचाने की जरूरत है, जिनके हस्ताक्षर, अनुमोदन और फाइल संचालन से भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।

कार्य आवंटन में भी उठे थे सवाल !

15 जुलाई 2026 को नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय की ओर से अधिकारियों के कार्य आवंटन की सूची जारी की गई थी। इस सूची के बाद भी निगम के भीतर सवाल उठे थे। आरोप है कि कुछ अधिकारियों को आवश्यकता से अधिक जिम्मेदारियां सौंप दी गईं, जबकि महत्वपूर्ण कार्यों के लिए संबंधित अधिकारी की कार्यक्षमता और अनुभव को लेकर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।
सबसे अधिक चर्चा जोनल स्वच्छता अधिकारी रवि निरंजन को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन-प्लांट्स का प्रभारी बनाए जाने को लेकर हुई। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन शहर की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं में शामिल है। ऐसे में इतने संवेदनशील कार्य के लिए वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी की तैनाती को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
नगर निगम में भ्रष्टाचार की जांच यदि वास्तव में गंभीरता से करनी है तो केवल ठेकेदारों के बयान या कुछ चुनिंदा फाइलों की जांच पर्याप्त नहीं होगी। पिछले वर्षों में कैंप कार्यालय से स्वीकृत फाइलें, भुगतान आदेश, वित्तीय स्वीकृतियां, निविदाएं, कार्यादेश और अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका को एक साथ जांचना होगा।

आरोप यह भी हैं कि तत्कालीन मुख्य वित्त अधिकारी से मिलीभगत कर कई फाइलों को नियमों से इतर तरीके से आगे बढ़ाया गया और करोड़ों रुपये के भुगतान का रास्ता तैयार हुआ। इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है, लेकिन यदि मुख्यमंत्री के निर्देश पर जांच चल रही है तो इन बिंदुओं को जांच के दायरे में लाना जरूरी है।

सवाल ठेकेदारों से आगे का है

मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद ठेकेदारों पर कार्रवाई से यह संदेश जरूर गया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ शासन गंभीर है। लेकिन नगर निगम के भीतर वर्षों से जमे कथित ‘सिस्टम’ पर कार्रवाई नहीं हुई तो पूरी कवायद अधूरी मानी जाएगी।
क्योंकि सवाल यह नहीं कि फाइल पर गलत काम किसने कराया, सवाल यह भी है कि फाइल किसने चलाई, किसने जांची, किसने हस्ताक्षर कराए और भुगतान की अंतिम मंजूरी तक कौन-कौन पहुंचा।
नगर निगम की जांच यदि उन्हीं अधिकारियों और कर्मचारियों के भरोसे होगी जिनकी भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, तो निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी है। ऐसे में अब निगाह शासन पर है कि ठेकेदारों के बाद नगर निगम के अंदर बैठे कथित ‘काकस’ तक जांच की आंच कब पहुंचती है।

गोविंद को लेकर नगर निगम में मची खलबली, अफसर-ठेकेदार पुलिस की रडार पर

मोबाइल नंबरों की पड़ताल में खुल सकता है लेनदेन का राज, करीब आधा दर्जन अफसर और एक दर्जन ठेकेदारों पर टिकी निगाह

प्रमुख संवाददाता स्वराज इंडिया
कानपुर। नगर निगम में मोटी रकम लेकर ठेके दिलाने के आरोप में मुकदमा दर्ज होने के बाद गोविंद शर्मा की तलाश में जुटी पुलिस ने अब उसके संपर्कों का जाल खंगालना शुरू कर दिया है। पुलिस आयुक्त ने स्पष्ट किया है कि गोविंद की मदद करने वालों के साथ-साथ उसके इशारे पर काम करने वाले ठेकेदारों और अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होगी। पुलिस की इस चेतावनी के बाद नगर निगम में गोविंद के नाम पर ठेके हासिल करने वाले अधिकारियों और ठेकेदारों में खलबली मच गई है।
नगर निगम से जुड़े सूत्रों के मुताबिक करीब आधा दर्जन अधिकारियों और एक दर्जन ठेकेदारों के नाम गोविंद के संपर्क में रहने वालों के तौर पर चर्चा में हैं। पुलिस अब गोविंद के मोबाइल नंबर और उससे लगातार संपर्क में रहे लोगों की पड़ताल कर रही है। मोबाइल कॉल विवरण और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर यह पता लगाने का प्रयास होगा कि गोविंद किन अधिकारियों, ठेकेदारों और अन्य लोगों के संपर्क में था।

कमीशन के बदले ठेके दिलाने का आरोप

गोविंद शर्मा पर नगर निगम में प्रभाव का इस्तेमाल कर ठेके दिलाने के नाम पर मोटी रकम वसूलने का आरोप है। चर्चा है कि जिन ठेकेदारों से अधिक कमीशन लिया गया, उन्हें काम दिलाने में मदद की गई। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि ठेका दिलाने की प्रक्रिया में किन अधिकारियों की भूमिका रही और गोविंद को किस स्तर से मदद मिलती थी।
पुलिस आयुक्त के मुताबिक जांच सिर्फ गोविंद तक सीमित नहीं रहेगी। उसके संपर्क में रहने वाले और मदद करने वाले लोगों की भूमिका सामने आने पर उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। इससे उन अधिकारियों और ठेकेदारों की चिंता बढ़ गई है, जिनका नाम गोविंद के साथ जोड़ा जा रहा है।

घटिया निर्माण कार्यों की शिकायतें भी जांच के दायरे में

जांच के दौरान ठेका दिलाने के कथित खेल के साथ निर्माण कार्यों की गुणवत्ता से जुड़ी शिकायतों को भी जांच के दायरे में लिया जा सकता है। आरोप है कि अधिक कमीशन देने वाले कुछ ठेकेदारों को काम मिलने के बाद कई स्थानों पर निर्माण की गुणवत्ता से समझौता किया गया। यदि पुलिस या नगर निगम की जांच में गड़बड़ी सामने आती है तो संबंधित ठेकेदारों और उनकी फर्मों पर भी कार्रवाई हो सकती है।

किसने कितनी बार की बात, खंगाले जाएंगे नंबर

पुलिस की जांच में गोविंद का मोबाइल नंबर महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकता है। उसके मोबाइल से अधिकारियों, ठेकेदारों और अन्य लोगों से हुई बातचीत और संपर्कों की पड़ताल की जा रही है। लगातार संपर्क में रहने वालों की पहचान होने के बाद जरूरत पड़ने पर कॉल विवरण और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर जांच आगे बढ़ाई जाएगी।
गोविंद के संपर्क में रहे अधिकारियों और ठेकेदारों से कथित लेनदेन, मोबाइल संपर्क, ठेका दिलाने में भूमिका और निर्माण कार्यों की गुणवत्ता से जुड़ी शिकायतों को पुलिस गंभीरता से देख रही है। पुलिस का कहना है कि जांच में जिसकी भी भूमिका सामने आएगी, उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

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