
मिशन-2027 में जुटी बीजेपी ने तेज किया संगठन का मंथन, बीएल संतोष के फीडबैक से लेकर विनोद तावड़े की रणनीति तक, बूथ स्तर पर समीकरण साधने की कवायद
स्वराज इंडिया ब्यूरो/ लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। चुनाव में अब कुछ ही महीने बाकी हैं और पार्टी लगातार संगठन की जमीनी स्थिति, जातीय समीकरण, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और संभावित एंटी-इनकंबेंसी का आकलन कर रही है। हालिया बैठकों से संकेत है कि बीजेपी अब सिर्फ सरकार की उपलब्धियों के भरोसे नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और कमजोर कड़ियों को दुरुस्त करने पर जोर दे रही है।
बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल संतोष ने हाल में लखनऊ और कानपुर में पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से फीडबैक लिया। वरिष्ठ नेताओं के साथ हुई बैठकों में संगठन की मजबूती, विपक्ष के नैरेटिव और जमीनी स्तर पर पार्टी के सामने आ रही चुनौतियों पर चर्चा हुई।
जातीय समीकरण पर बीजेपी का खास फोकस
2027 की चुनावी लड़ाई में जातीय समीकरण एक बार फिर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिखाई दे रहे हैं। बीजेपी ने प्रदेश संगठन की नई टीमों में जातीय और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर भी संतुलन साधने की कोशिश की है। हालांकि, नई संगठनात्मक नियुक्तियों के बाद कुछ क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल और असंतोष की खबरें भी सामने आई हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक पार्टी अब बूथ स्तर पर अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। हर समाज के बीच उसी समुदाय से जुड़े कार्यकर्ताओं की टीम के जरिए संपर्क बढ़ाने की योजना को संगठन की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।
कार्यकर्ताओं की नाराजगी बनी चिंता
बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत उसका बूथ स्तर का कैडर माना जाता है। ऐसे में पार्टी के लिए कार्यकर्ताओं की नाराजगी को समय रहते दूर करना अहम हो गया है। हालिया संगठनात्मक बैठकों में नेताओं से जमीनी स्तर की कमजोरियों और चुनावी तैयारियों को लेकर खुलकर फीडबैक लिया गया।
बीएल संतोष की बैठकों में भी संगठन की वास्तविक स्थिति और उन इलाकों की पहचान पर जोर रहा, जहां पार्टी को अतिरिक्त मेहनत की जरूरत है।
100 से ज्यादा विधायकों पर एंटी-इनकंबेंसी का दावा
बीजेपी के अंदरूनी आकलन को लेकर सामने आ रही रिपोर्टों में कई विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी की बात कही जा रही है। आपके मूल इनपुट के मुताबिक पार्टी के एक सर्वे में 100 से ज्यादा विधायकों के खिलाफ मजबूत एंटी-इनकंबेंसी का दावा किया गया है।
हालांकि, इस आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध विश्वसनीय स्रोतों से नहीं हो सकी है। इसलिए इसे पार्टी के आधिकारिक आंकड़े के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
फिर भी उम्मीदवार चयन को लेकर बीजेपी ने बहुस्तरीय फीडबैक व्यवस्था पर काम शुरू कर दिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार संगठन, सरकार से जुड़ाव, केंद्रीय नेतृत्व का स्वतंत्र आकलन और संघ की जमीनी रिपोर्ट जैसे अलग-अलग इनपुट को मिलाकर उम्मीदवारों पर फैसला लेने की तैयारी है।
चार बड़े मुद्दे बीजेपी के लिए चुनौती
ताजा रिपोर्टों में बीजेपी के सामने कई ऐसे मुद्दों का जिक्र है, जिनका असर 2027 के चुनाव पर पड़ सकता है। इनमें युवाओं में रोजगार को लेकर असंतोष, जातीय तनाव, आरक्षण से जुड़े विवाद और कैडर की थकान/नाराजगी प्रमुख हैं।
विपक्ष भी इन मुद्दों को चुनावी नैरेटिव में बदलने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में बीजेपी के सामने चुनौती सरकार की उपलब्धियों को जमीनी मतदाता तक पहुंचाने के साथ-साथ विपक्ष के हमलों का जवाब देने की भी है।
योगी की सक्रियता और 115 सीटों पर खास नजर
इन चुनौतियों के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अपनी चुनावी सक्रियता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी ने करीब 115 विधानसभा सीटों पर विशेष फोकस किया है, जहां 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन को बढ़त मिली थी। योगी इन इलाकों में विकास परियोजनाओं और सरकारी योजनाओं के जरिए पार्टी का आधार मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
यानी बीजेपी की रणनीति दो स्तरों पर चल रही है—एक तरफ सरकार के कामकाज और योगी की लोकप्रियता को चुनावी मुद्दा बनाना, दूसरी तरफ उन सीटों पर संगठन को दोबारा मजबूत करना जहां पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी को झटका लगा था।
18,900 बूथों पर भी बीजेपी की नजर
बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में कमजोर पड़े बूथों को भी अपनी रणनीति में शामिल किया है। रिपोर्ट के अनुसार पार्टी करीब 18,900 ऐसे बूथों पर विशेष ध्यान दे रही है, जहां 2022 विधानसभा चुनाव में बीजेपी मजबूत थी लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे नुकसान हुआ।
इन बूथों को वापस मजबूत करना पार्टी के मिशन-2027 का अहम हिस्सा माना जा रहा है।
BSP के कमजोर होने से किसे फायदा?
उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में बहुजन समाज पार्टी की स्थिति भी बीजेपी और विपक्ष दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। 2024 के लोकसभा चुनाव में BSP का प्रदर्शन कमजोर रहा था। ऐसे में उसके पारंपरिक वोट बैंक में होने वाले बदलाव का सीधा असर कई विधानसभा सीटों के समीकरण पर पड़ सकता है।
बीजेपी दलित और गैर-यादव ओबीसी मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रही है, जबकि विपक्ष भी PDA और सामाजिक न्याय के मुद्दों के जरिए व्यापक सामाजिक गठजोड़ बनाने की कोशिश में है। जातीय समीकरणों की यही लड़ाई 2027 में कई सीटों के नतीजे तय कर सकती है।
सोशल मीडिया और युवा वोटरों पर भी फोकस
2027 के चुनाव में युवाओं और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। रोजगार, भर्ती परीक्षाएं, बेरोजगारी और शिक्षा से जुड़े मुद्दे विपक्ष के प्रमुख हथियार बन सकते हैं।
बीजेपी भी सोशल मीडिया और डिजिटल नैरेटिव को मजबूत करने की तैयारी में है। पार्टी के सामने चुनौती है कि सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को युवाओं तक प्रभावी तरीके से पहुंचाया जाए और विपक्ष के आरोपों का जवाब दिया जाए।
अगले कुछ महीने बीजेपी के लिए निर्णायक
कुल मिलाकर यूपी में बीजेपी का चुनावी अभियान अब पूरी तरह संगठनात्मक मोड में जाता दिखाई दे रहा है। बीएल संतोष का जमीनी फीडबैक, विनोद तावड़े की संगठनात्मक रणनीति, बूथ स्तर पर सामाजिक समीकरण और उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग—इन सभी मोर्चों पर पार्टी तेजी से काम कर रही है।
वहीं, युवाओं की नाराजगी, जातीय समीकरण, कार्यकर्ताओं की शिकायतें और कुछ विधायकों के खिलाफ संभावित एंटी-इनकंबेंसी बीजेपी के लिए चुनौती बनी हुई है। आने वाले महीनों में पार्टी इन कमजोरियों को कितना दूर कर पाती है, यही 2027 की चुनावी लड़ाई में उसकी स्थिति तय करने वाले बड़े कारकों में शामिल होगा।


