
स्वराज इंडिया ब्यूरो/कानपुर, 13 अक्टूबर 2026। उत्तर प्रदेश की राजनीति में चर्चित नारा ‘बंटोगे तो कटोगे’ एक बार फिर कानपुर में चर्चा का विषय बन गया है। बिरहाना रोड स्थित मां तपेश्वरी मंदिर पर इस नारे वाली होल्डिंग लगाए जाने की खबर है। होल्डिंग पर भाजपा के विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) सलिल विश्नोई का नाम दर्ज होने की बात सामने आई है। इसके बाद संदेश के उद्देश्य और उसके राजनीतिक मायनों को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब उत्तर प्रदेश में धार्मिक आयोजनों और राजनीतिक संदेशों को लेकर सार्वजनिक चर्चा जारी है। हालांकि, होल्डिंग किसने लगवाई और इसके पीछे क्या उद्देश्य है, इस बारे में आधिकारिक पुष्टि के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
मंदिर पर लगे नारे ने क्यों खींचा ध्यान?
मां तपेश्वरी मंदिर कानपुर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। नवरात्र के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ऐसे स्थान पर ‘बंटोगे तो कटोगे’ जैसा राजनीतिक विमर्श से जुड़ा नारा दिखाई देने पर लोगों का ध्यान खिंचना स्वाभाविक है।
भाजपा एमएलसी सलिल विश्नोई हाल ही में नवरात्र के दौरान तपेश्वरी माता मंदिर और आसपास के क्षेत्र की व्यवस्थाओं का जायजा लेने भी पहुंचे थे। हालांकि, उनके इस दौरे से मौजूदा होल्डिंग के लगाए जाने का सीधा संबंध साबित नहीं होता।
‘बंटोगे तो कटोगे’ के क्या हैं राजनीतिक मायने?
‘बंटोगे तो कटोगे’ नारा उत्तर प्रदेश की राजनीति में एकजुटता के संदेश के रूप में प्रमुखता से सामने आया था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस नारे के इस्तेमाल के बाद यह राजनीतिक बहस का हिस्सा बना और अलग-अलग अवसरों पर इसके पक्ष तथा विरोध में प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं।
समर्थक इसे सामाजिक एकता का संदेश बताते हैं, जबकि आलोचक सवाल उठाते हैं कि ऐसे नारों का इस्तेमाल राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए भी हो सकता है। इसीलिए मंदिर पर लगी होल्डिंग को लेकर भी यह चर्चा हो रही है कि संदेश का उद्देश्य धार्मिक एकजुटता दिखाना है या इसके साथ कोई राजनीतिक संकेत भी जुड़ा है।
धार्मिक स्थल पर राजनीतिक संदेश, उठे सवाल
धार्मिक स्थलों पर सामाजिक और राजनीतिक संदेश प्रदर्शित किए जाने को लेकर पहले भी बहस होती रही है। वर्ष 2024 में कानपुर के आनंदेश्वर मंदिर में इसी नारे से जुड़े बोर्ड लगाए जाने के बाद चर्चा हुई थी। उस समय मंदिर प्रबंधन की ओर से कहा गया था कि बोर्ड किसने लगाया, इसकी जानकारी नहीं थी और प्रबंधन का उससे कोई संबंध नहीं था। <Cite refs=
हालांकि, आनंदेश्वर मंदिर का वह मामला अलग था। उसे बिरहाना रोड स्थित तपेश्वरी मंदिर की मौजूदा होल्डिंग से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा। दोनों घटनाओं के संदर्भ और जिम्मेदारी की अलग-अलग पुष्टि जरूरी है।
सलिल विश्नोई की भूमिका पर नजर
होल्डिंग पर सलिल विश्नोई का नाम होने की बात सामने आने के बाद उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। लेकिन केवल नाम दर्ज होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि होल्डिंग उन्होंने ही लगवाई या उसके संदेश को लेकर उनकी कोई आधिकारिक घोषणा हुई है।
इस मामले में उनकी प्रतिक्रिया, होल्डिंग लगाने वाले व्यक्ति या संगठन की पहचान और मंदिर प्रबंधन का पक्ष सामने आने के बाद ही स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।
एक होल्डिंग, कई सवाल
फिलहाल कानपुर में इस होल्डिंग को लेकर चर्चा का केंद्र यही है कि धार्मिक स्थल पर लगाए गए संदेश को किस रूप में देखा जाए। क्या यह सामाजिक एकजुटता की अपील है, क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक संदेश है, या यह किसी समर्थक की पहल है—इन सवालों के जवाब संबंधित पक्षों की पुष्टि के बाद ही मिल सकेंगे।
निष्कर्ष: तपेश्वरी मंदिर पर ‘बंटोगे तो कटोगे’ नारे वाली होल्डिंग ने कानपुर में राजनीतिक चर्चा को फिर हवा दी है। लेकिन इसके पीछे की मंशा और जिम्मेदारी तय करने के लिए आधिकारिक प्रतिक्रिया और स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।


