
कोर्ट ने मेरठ कप्तान की निजी पेशी के दौरान उनको कोर्ट रूम में घंटों खड़ा रखा और पूछा कि “क्यूँ ना आप पर contempt of court का मुकदमा चलाया जाए!!
स्वराज इंडिया ब्यूरो/प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के अधिकारियों को अदालत के आदेशों के पालन और सरकारी वकीलों के साथ व्यवहार को लेकर सख्त संदेश दिया है। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने निर्देश दिया कि प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) सभी पुलिस अधिकारियों के लिए सर्कुलर जारी करें। इसमें स्पष्ट किया जाए कि अदालत के आदेशों के अनुपालन के लिए सूचना देने वाले सरकारी विधि अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार को गंभीरता से लिया जाएगा और कानून के अनुसार कार्रवाई हो सकती है।
क्या है पूरा मामला?
रिपोर्टों के मुताबिक, यह मामला सचिन यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य से जुड़ी जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। मामले में हाईकोर्ट ने एक जांच अधिकारी की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया था। जांच अधिकारी के अदालत में पेश न होने के बाद संबंधित पुलिस अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए गए।
सुनवाई के दौरान आजमगढ़ के SSP डॉ. अनिल कुमार ने अदालत को बताया कि मामले में लापरवाही को लेकर संबंधित पुलिसकर्मियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। सरकारी वकील को फोन पर अदालत के आदेश की जानकारी देने के दौरान कथित दुर्व्यवहार के मामले में SSP के PRO राजेश कुमार सिंह को नोटिस देने के साथ पद से भी हटा दिया गया।
अदालत ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी वकील अदालत के अधिकारी के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। जब वे न्यायालय के आदेश के अनुपालन के लिए किसी पुलिस अधिकारी को सूचना देते हैं, तो उनके साथ दुर्व्यवहार गंभीर मामला हो सकता है।
अदालत ने उत्तर प्रदेश के DGP को इस संबंध में सभी पुलिस अधिकारियों के लिए निर्देश जारी करने को कहा। सुनवाई के दौरान PRO राजेश कुमार सिंह को शाम पांच बजे तक अदालत की हिरासत में रखने का आदेश भी दिया गया था, जिसके बाद उन्हें रिहा किया जाना था।

NBW के पालन को लेकर भी अहम टिप्पणी
अदालत ने गैर-जमानती वारंट के अनुपालन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हाईकोर्ट से जारी NBW मिलने पर संबंधित पुलिस अधिकारी को आरोपी की गिरफ्तारी और उसे अदालत में पेश किए जाने की जिम्मेदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। केवल औपचारिक सूचना या प्रक्रिया आगे बढ़ाना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
पुलिस जवाबदेही पर फिर चर्चा
इस घटनाक्रम ने न्यायालय के आदेशों के पालन और पुलिस प्रशासन की जवाबदेही को लेकर चर्चा तेज कर दी है। अदालत की टिप्पणी का संदेश साफ है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों को भी न्यायिक निर्देशों का पालन पूरी गंभीरता से करना चाहिए।


