
रिपोर्ट – आर एस त्रिवेदी / कानपुर देहात
स्लग – कानपुर देहात के जरसेन गांव में बारिश ने एक गरीब परिवार की जिंदगी में ऐसा मातम उतार दिया, जिसे शब्दों में बयां करना भी मुश्किल है। जिस कच्ची छत के नीचे मुकेश कुमार का परिवार मजबूरी में जिंदगी गुजार रहा था, वही छत आज उनके लिए मौत की छत बन गई। तेज बारिश के बीच कच्ची छत भरभराकर गिरी और मलबे के नीचे मुकेश व उनके दोनों बच्चे—7 साल की मासूम पलक और 3 साल का लविश दब गए। ग्रामीणों ने मलबा हटाकर दोनों मासूमों को बाहर निकाला, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मुकेश खुद भी गंभीर रूप से घायल हैं। सबसे भयावह बात यह है कि मुकेश के परिवार में यही दो बच्चे थे और आज दोनों इस दुनिया में नहीं हैं। परिवार का कहना है कि मुकेश वर्षों से पक्के आवास के लिए अधिकारियों की चौखट पर दस्तक देते रहे, फरियाद करते रहे, लेकिन उनकी पुकार जिम्मेदारों के कानों तक नहीं पहुंची। सरकार गरीबों को पक्की छत देने के दावे करती है, आवास योजनाओं का ढिंढोरा पीटा जाता है, लेकिन जरसेन की यह तस्वीर उन दावों की जमीनी हकीकत पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। अगर समय रहते मुकेश के परिवार को एक पक्की छत मिल जाती, तो शायद आज पलक और लविश की सांसें चल रही होतीं। आज वही मुकेश, जो सालों से आवास की आस लगाए बैठा था, अपनी आंखों के सामने अपने दोनों बच्चों को खो चुका है।
वीओ – बच्चों की मौत की खबर ने मां को पूरी तरह तोड़ दिया है। वह बेसुध है, रोते-रोते उसकी आवाज तक चली गई है और वह किसी सवाल का जवाब देने की स्थिति में नहीं है। घर में वह बार-बार भगवान श्रीराम का नाम लेकर अपने बच्चों को याद कर रही है और राम नाम का जाप करते हुए मातम मना रही है। उधर अस्पताल में घायल पिता मुकेश कुमार अपने शारीरिक दर्द से कहीं ज्यादा बच्चों के बिछड़ने के दर्द में कराह रहे हैं। आंखों से आंसू थम नहीं रहे और मुकेश बार-बार भगवान से यही कह रहे हैं—“मेरे बच्चों की जगह मुझे उठा लिया होता।” उनका कहना है कि जिन बच्चों के लिए मां-बाप अपनी पूरी जिंदगी खपा देते हैं, जिनके भविष्य के लिए घर-द्वार और हर सुख-सुविधा जुटाने का सपना देखते हैं, जब वही दोनों बच्चे उनसे हमेशा के लिए छिन जाएं तो जिंदगी में बचता ही क्या है। मुकेश की टूटती आवाज में बच्चों को खोने का ऐसा दर्द है, जिसे सुनकर पत्थर दिल भी पसीज जाए। मां-बाप की पूरी दुनिया आज उन्हीं बच्चों की तस्वीरों और यादों में सिमट गई है। एक तरफ मां बेसुध होकर राम नाम जप रही है, तो दूसरी तरफ अस्पताल के बिस्तर पर घायल पिता बच्चों के गम में रो रहा है। यह सिर्फ बारिश से ढही एक छत नहीं है, यह एक परिवार की उम्मीदों, खुशियों और भविष्य का मलबा है, जिसके नीचे दो मासूम जिंदगियां दफन हो गईं। अब सवाल सिर्फ मुआवजे का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की जवाबदेही का है, जिसने परिवार के मुताबिक वर्षों तक उनकी आवास की फरियाद नहीं सुनी और आज एक गरीब परिवार अपने दोनों मासूम बच्चों को खोकर जिंदगी के सबसे भयावह दर्द से गुजर रहा है।
वीओ – परिजनों का दर्द यह है कि अब अगर प्रशासन मकान दे भी दे, तो उस मकान का क्या करेंगे? जिस पक्की छत के लिए परिवार वर्षों से इंतजार कर रहा था, आज वह छत भी उनके किसी काम की नहीं रही, क्योंकि उस घर को आबाद करने वाले दोनों मासूम बच्चे ही इस दुनिया से चले गए। परिजनों का कहना है कि “जिस मकान के लिए हम तरसते रहे, अगर वह पहले मिल जाता तो शायद हमारे बच्चे आज जिंदा होते… अब मकान मिलेगा भी तो किसके लिए?


