
स्वराज इंडिया ब्यूरो/लखनऊ में एलडीए को लेकर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के बयान के बाद सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। अखिलेश यादव ने जेपीएनआईसी को निजी हाथों में दिए जाने के फैसले पर एलडीए के नाम को लेकर सवाल उठाए थे। अब उनके बयान के जवाब में सपा सरकार के कार्यकाल की कई परियोजनाओं और उनसे जुड़े विवादों का हवाला देते हुए सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
एलडीए को लेकर जारी राजनीतिक बहस में अब अंसल-सुशांत गोल्फ सिटी, जेपीएनआईसी और गोमती रिवरफ्रंट जैसी परियोजनाएं चर्चा के केंद्र में हैं। सपा सरकार के कार्यकाल को लेकर आलोचकों का कहना है कि लखनऊ में कई बड़ी परियोजनाओं में लागत, निगरानी, निर्माण में देरी और नियामकीय कार्रवाई से जुड़े सवाल उठे।
अंसल-सुशांत गोल्फ सिटी मामले में बंधक भूखंडों की बिक्री और होमबायर्स से जुड़े विवाद लंबे समय से सामने आते रहे हैं। इस मामले में एलडीए की भूमिका, जमीनों की स्थिति और रजिस्ट्री से जुड़े सवालों को लेकर जांच और कानूनी कार्रवाई हुई है। हालांकि, अलग-अलग मामलों के आरोपों और उनकी अंतिम कानूनी स्थिति में अंतर है, इसलिए जिम्मेदारी तय करने के लिए संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण है।
जेपीएनआईसी को लेकर भी सपा और भाजपा के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप जारी है। परियोजना पर अब तक करीब 821.74 करोड़ रुपये खर्च होने की जानकारी सरकार ने दी है। जुलाई 2025 में राज्य कैबिनेट ने जेपीएनआईसी सोसायटी को खत्म कर इसकी जिम्मेदारी एलडीए को सौंप दी थी। इसके बाद 2026 में वैश्विक निविदा प्रक्रिया के जरिए निजी कंसोर्टियम को परियोजना के संचालन और अधूरे काम पूरे करने की जिम्मेदारी देने का फैसला हुआ।
मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक चयनित कंसोर्टियम को बचे हुए निर्माण कार्य अपने खर्च पर पूरे करने हैं। उसे 25 करोड़ रुपये की परफॉर्मेंस गारंटी जमा करनी होगी और संचालन शुरू होने के बाद एलडीए को सालाना 6 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा, जिसमें हर वर्ष 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी का प्रावधान है।
गोमती रिवरफ्रंट परियोजना भी सपा सरकार के समय की प्रमुख योजनाओं में शामिल रही। परियोजना की शुरुआती अनुमानित लागत करीब 656.58 करोड़ रुपये थी, जो बाद में लगभग 1,531 करोड़ रुपये तक पहुंची। 2017 में तत्कालीन सरकार ने बताया था कि परियोजना पर बड़ी राशि खर्च हो चुकी थी, जबकि काम की प्रगति को लेकर विवाद सामने आया। बाद में परियोजना में कथित अनियमितताओं की जांच और सीबीआई जांच की प्रक्रिया भी शुरू हुई।
परियोजनाओं का हवाला देते हुए अब सवाल उठाया जा रहा है कि सपा शासन के दौरान एलडीए, राजस्व और पंजीकरण विभाग की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी थी और विवादित परियोजनाओं में समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
वहीं, मौजूदा सरकार का कहना है कि वह पिछली सरकार की अधूरी परियोजनाओं को पूरा करने और होमबायर्स से जुड़े मामलों के समाधान की दिशा में काम कर रही है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी मौजूदा सरकार पर जेपीएनआईसी जैसे सार्वजनिक प्रोजेक्ट को निजी हाथों में देने को लेकर सवाल उठा रही है।
एलडीए को लेकर चल रही राजनीतिक बहस केवल एक प्राधिकरण के भविष्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें लखनऊ की जमीन, आवासीय परियोजनाओं, सार्वजनिक संपत्तियों और अधूरी विकास योजनाओं की जवाबदेही का मुद्दा भी जुड़ गया है।


