
स्वराज इंडिया ब्यूरो/लखनऊ। उत्तर प्रदेश में लंबित मुकदमों के बढ़ते बोझ को कम करने के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में 15 सितंबर 2026 को हुई कैबिनेट बैठक में प्रदेश के 75 जिलों में पहले चरण में 900 नई अदालतों की स्थापना को मंजूरी दी गई। सरकार के मुताबिक, यह कदम न्यायिक व्यवस्था की क्षमता बढ़ाने और लंबित मामलों के निस्तारण में तेजी लाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
75 जिलों में 1.20 करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित
उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में कुल 1,20,66,105 मामले लंबित बताए गए हैं। वित्त मंत्री सुरेश खन्ना के अनुसार, इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से न्यायिक जरूरतों के आकलन के आधार पर प्रदेश में कुल 9,149 अतिरिक्त अदालतों की आवश्यकता बताई गई है। इसी व्यापक जरूरत को देखते हुए पहले चरण में 900 अदालतों की स्थापना को मंजूरी दी गई है।
900 अदालतों में किस स्तर की कोर्ट होंगी
स्वीकृत 900 अदालतों में तीन स्तर की अदालतें शामिल हैं
- 237 अपर जिला एवं सत्र न्यायालय
- 391 सिविल जज सीनियर डिवीजन न्यायालय
- 272 सिविल जज जूनियर डिवीजन न्यायालय
इन अदालतों का जिला-वार आवंटन वहां लंबित मुकदमों की संख्या और न्यायिक जरूरत के आधार पर किया जाएगा, इसलिए सभी जिलों को समान संख्या में अदालतें मिलना जरूरी नहीं है।
9,084 पदों को भी मंजूरी
नई अदालतों के संचालन के लिए कुल 9,084 पदों के सृजन को मंजूरी दी गई है। इनमें 6,656 नियमित पद और 2,428 आउटसोर्स पद शामिल हैं। इन पदों में न्यायिक व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ स्टेनोग्राफर, रीडर, मुंसरिम, वरिष्ठ सहायक और कनिष्ठ सहायक जैसे पद भी शामिल होंगे।
हालांकि, पदों को मंजूरी मिलने का मतलब यह नहीं है कि सभी पदों पर भर्ती तत्काल शुरू हो गई है। प्रस्ताव के अनुसार नियुक्तियों की प्रक्रिया मौजूदा स्वीकृत रिक्तियों को भरने और जरूरी आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध होने के बाद आगे बढ़ेगी।
हर साल करीब 693.60 करोड़ रुपये का खर्च
सरकार के अनुसार 900 नई अदालतों और उनसे जुड़े पदों के संचालन पर करीब 693.60 करोड़ रुपये का वार्षिक आवर्ती खर्च आएगा। इसके अलावा लगभग 8.72 करोड़ रुपये का अनावर्ती खर्च स्वीकृत किया गया है। इस राशि में अदालतों के भवन और अन्य बड़े बुनियादी ढांचे का खर्च शामिल नहीं है।
क्या लंबित मामलों का बोझ तुरंत कम होगा
नई अदालतों की स्थापना से सुनवाई की क्षमता बढ़ सकती है, लेकिन इससे लंबित मामलों का तत्काल निस्तारण सुनिश्चित नहीं होता। अदालतों के प्रभावी संचालन के लिए न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति, कोर्ट रूम, रिकॉर्ड व्यवस्था और अन्य जरूरी संसाधनों की उपलब्धता भी जरूरी होगी।
इस लिहाज से 900 अदालतों की मंजूरी को न्यायिक क्षमता बढ़ाने के पहले चरण के रूप में देखा जा रहा है। आगे जिला-वार आवंटन, आधारभूत ढांचे और नियुक्तियों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही इसका वास्तविक असर सामने आएगा।
पहले चरण के बाद आगे क्या
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आकलन में 9,149 अतिरिक्त अदालतों की जरूरत बताई गई है, जबकि फिलहाल 900 अदालतों को मंजूरी मिली है। यानी सरकार की योजना चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की है। अब इन अदालतों के लिए स्थान, स्टाफ, न्यायिक अधिकारियों और अन्य संसाधनों की व्यवस्था अगला महत्वपूर्ण चरण होगा।
कुल मिलाकर, यूपी सरकार का यह फैसला राज्य की न्यायिक व्यवस्था में अतिरिक्त क्षमता तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम है, लेकिन लंबित मामलों की संख्या में वास्तविक कमी नई अदालतों के पूरी तरह चालू होने और उनके नियमित संचालन के बाद ही आंकी जा सकेगी।


