Wednesday, April 1, 2026
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मध्यप्रदेश में 27 प्रतिशत आरक्षण को लेकर भारी बवाल

मोहन यादव की जातिगत राजनीति से मध्य प्रदेश से लेकर पूरे देश में सवर्ण समाज में गहराया आक्रोश

कई जगह चल रहे विरोध प्रदर्शन, भाजपा को हो सकता है नुकसान

स्वराज इंडिया न्यूज ब्यूरो भोपाल।
मध्यप्रदेश की सियासत इन दिनों एक बार फिर जातिगत आरक्षण की आग में झुलस रही है। मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार द्वारा ओबीसी आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% करने की कोशिश ने पूरे राज्य में सवर्ण समाज और युवा वर्ग के बीच गहरा असंतोष पैदा कर दिया है।
जहाँ सरकार इसे “सामाजिक न्याय” का कदम बता रही है, वहीं विपक्ष और सवर्ण संगठन इसे “योग्यता पर हमला” और “जातिगत ध्रुवीकरण” की साजिश करार दे रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में 8 अक्टूबर से इस मामले की रोज़ाना सुनवाई होगी।
अगर अदालत ने 27% ओबीसी आरक्षण को मंज़ूरी दी, तो यह देशभर के लिए नया उदाहरण बन जाएगा।
लेकिन अगर इसे असंवैधानिक माना गया, तो सरकार को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना पड़ेगा।

सवर्ण समाज में उठी आवाज़ अब केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतावनी बन चुकी है।
भाजपा के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वह “सामाजिक न्याय” और “योग्यता आधारित अवसर” के बीच संतुलन कैसे बनाए।
राज्य की राजनीति अब सिर्फ आरक्षण के इर्द-गिर्द नहीं घूम रही — बल्कि यह नए सामाजिक समीकरणों की जंग का संकेत है।

73% आरक्षण की ओर बढ़ता मध्यप्रदेश

मोहन यादव सरकार ने हाल ही में राज्य सेवाओं और शिक्षण संस्थानों में ओबीसी आरक्षण को 27% तक बढ़ाने का प्रस्ताव तैयार किया है।
यदि यह लागू होता है, तो मध्यप्रदेश में कुल आरक्षण सीमा 73% तक पहुँच जाएगी — जिसमें अनुसूचित जाति (SC) को 16%, अनुसूचित जनजाति (ST) को 20%, ओबीसी को 27% और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को 10% आरक्षण मिलेगा।
यह आंकड़ा सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट की 50% आरक्षण सीमा को पार करता है, जो 1992 के ऐतिहासिक इंदिरा साहनी केस (मंडल कमीशन) में तय की गई थी।
इसी आधार पर इस निर्णय को अदालत में चुनौती दी गई है, और अब सुप्रीम कोर्ट में इसकी नियमित सुनवाई 8 अक्टूबर से शुरू हो रही है।

कानूनी दलीलें और विवादित रिपोर्ट

राज्य सरकार का कहना है कि मध्यप्रदेश की ओबीसी आबादी करीब 48–50% है, जबकि सरकारी सेवाओं और शिक्षण संस्थानों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है। इसलिए, “विशेष परिस्थितियों” में 50% की सीमा पार करना न्यायोचित है।
हालांकि, सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए दस्तावेजों में महाजन आयोग (1983) की रिपोर्ट और कुछ पुराने शोध दस्तावेज शामिल किए गए हैं, जिनमें धर्मग्रंथों से लिए गए अंशों को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
कई संगठनों ने आरोप लगाया कि इन दस्तावेजों में “हिंदू समाज को नीचा दिखाने वाले उद्धरण” शामिल हैं।
सरकार ने सफाई दी कि ये उद्धरण “नीति का हिस्सा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक संदर्भों के रूप में” संलग्न किए गए थे।

सवर्ण समाज का फूटा गुस्सा

राज्य के कई जिलों में सवर्ण समाज और युवा संगठनों ने “योग्यता का सम्मान चाहिए, आरक्षण नहीं” जैसे नारे लगाते हुए प्रदर्शन किए।
भोपल, उज्जैन, ग्वालियर और जबलपुर में प्रदर्शनकारियों ने कहा कि भाजपा, जिसे सवर्ण समाज ने दशकों तक समर्थन दिया, अब उन्हीं के भविष्य से खिलवाड़ कर रही है।
स्वर्ण युवा मंच और ब्राह्मण महासभा जैसे संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार आरक्षण वृद्धि को वापस नहीं लेती, तो राज्यव्यापी आंदोलन चलाया जाएगा। “यह निर्णय सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि योग्यता की हत्या है। मेहनती युवा केवल जाति के नाम पर पीछे नहीं रह सकता,”
— अनिल मिश्रा, संयोजक, स्वर्ण युवा मंच (भोपाल)।
कांग्रेस ने सरकार पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा अदालत में कुछ और कहती है, और जनता के सामने कुछ और।
वहीं समाजवादी और बहुजन संगठनों ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि “सामाजिक प्रतिनिधित्व ही असली समानता है।” भाजपा प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने बयान दिया है कि “मोहन यादव सरकार सबको साथ लेकर चलने के लिए प्रतिबद्ध है। ओबीसी को न्याय देना किसी के हक़ में कटौती नहीं है। कोर्ट में सच्चाई सामने आ जाएगी।”

बेरोज़गारी और आरक्षण का टकराव

राज्य में बेरोज़गारी दर लगातार बढ़ रही है — CMIE के आंकड़ों के मुताबिक सितंबर 2025 में मध्यप्रदेश की बेरोज़गारी दर 9.4% तक पहुँच गई।
ऐसे में, युवाओं का गुस्सा आरक्षण को लेकर और भी उग्र हो रहा है।
कई छात्रों का कहना है कि सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या में जातिगत आधार पर आरक्षण का अनुपात बढ़ाने से “मेहनती उम्मीदवारों के अवसर घटते जा रहे हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार (1992) में यह स्पष्ट किया था कि आरक्षण की सीमा 50% से अधिक नहीं हो सकती, जब तक कोई “असाधारण परिस्थिति” न हो।
तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इससे ऊपर आरक्षण को लेकर पहले भी कानूनी टकराव हुए हैं।
अब मध्यप्रदेश का मामला इस पूरे देश में आरक्षण नीति की दिशा तय करने वाला मुकदमा बन सकता है।

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