डीएम बनाम सीएमओ मामले में राजनेताओं के कूदने से दो धड़ों में नजर आए भाजपाई

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निर्मल तिवारी / स्वराज इंडिया कानपुर
सीएमओ के निलंबन के साथ कानपुर की प्रशासनिक फिजाएं शांत और अनुशासित नजर आ रही हैं। नए सीएमओ की डीएम साहब को भेंट स्वरूप पौधा देने की तस्वीर प्रशासनिक स्तर पर फिलहाल आल इज वेल की बानगी बना रही है। वहीं राजनीतिक वातावरण में भाजपा का अंदरूनी क्लेश से बढ़ती गर्मी महसूस हो रही है। कानपुर दक्षिण युवा मोर्चा अध्यक्ष अंकित गुप्ता ने कल एक पोस्ट कर इस पूरे विवाद को और गहरा कर दिया। अंकित गुप्ता ने डीएम बनाम सीएमओ की लड़ाई को अब मूल भाजपाई बनाम आयातित भाजपाई घोषित कर दिया है। राजनीति में थोड़ा भी इंटरेस्ट रखने वाले लोग जानते हैं कि अंकित गुप्ता महाना खेमें के हैं और उन्हें विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना का वरदहस्त प्राप्त है। प्रश्न यह उठ रहा है कि क्या इस तमाम विवाद में स्वयं को अलग रखे नजर आ रहा कानपुर भाजपा संगठन भी अब धीरे-धीरे इस विवाद की चपेट में आ जाएगा? यदि समय रहते कानपुर बीजेपी की इस बीमारी का इलाज नहीं किया गया तो आने वाले वक्त में बीजेपी को इसका बड़ा खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है। क्योंकि इस मुद्दे का प्रभाव क्षेत्र कानपुर ही न रहकर पूरा यूपी बल्कि कहा जाए पूरा देश बन सकता है। विशेष रूप से उसे स्थिति में जब पीडीए रथ पर सवार विपक्ष ने इस प्रकरण में भी जाति का एंगल उछालना शुरू कर दिया है।
भाजपा में छिड़ी अंदरूनी जंग, 2027 में दे सकता है नुकसान
कानपुर में प्रशासनिक अफसर के बीच शुरू हुई तकरार अब भाजपा की अंदरूनी लड़ाई बन गई है। मूल बनाम इंपोर्टेड जैसी पोस्ट इस लड़ाई को अब एक नए धरातल पर लेकर जा रही है। इसका कारण है दोनों ही पक्षों के अति उत्साही कार्यकर्ता। दरअसल इस पूरे प्रकरण में सीएमओ के पक्ष में भले ही तीन चिट्ठी लिखी गई हों लेकिन एमएलसी अरुण पाठक और गोविंद नगर विधायक सुरेंद्र मैथानी ने समझदारी दिखाते हुए स्वयं को इस प्रकरण से अलग कर लिया।इन माननीयों की लाइन समझ कर दोनों के समर्थक भी इस मुद्दे पर मौन हो गए। लेकिन महाना समर्थकों की अति सक्रियता और बड़बोलेपनने इस मुद्दे को महाना की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया। जबकि चिट्ठी के विषय में जैसे विचार अरुण पाठक और सुरेंद्र मैथानी ने व्यक्त किए थे लगभग उसी अंदाज में विधानसभा अध्यक्ष भी अपनी बात पत्रकारों से कह चुके थे।
जयघोष ने आग में डाला घी
दरअसल निलंबन आदेश आने के पहले ही कानपुर बीजेपी में गुटबाजी का एक त्रिकोण उभर चुका था। जिसमें तीनों बिंदुओं पर महेश त्रिवेदी, अभिजीत सिंह सांगा और सतीश महाना नजर आ रहे थे। निलंबन आदेश आने के बाद बिठूर और किदवई नगर में उठी जयघोष की ध्वनियों से महाराजपुर तिलमिला गया।
समर्थकों की निगाह में उनका नेता ही सुप्रीम
गाहे बगाहे, चलते फिरते इन तीन विधायकों का काफिला अगर आपके आसपास से गुजरा होगा तो अपने स्वयं ही कभी “जय अभिजीत” तो कभी “जय महेश” और कभी “जिसके साथ जमाना है….” जैसे नारे सुने होंगे। दरअसल यह नारे उनके समर्थकों की मनोस्थिति को बताते हैं। कहने को तो ये सब भाजपाई हैं लेकिन इन समर्थकों के लिए उनके पक्ष का विधायक ही इनका संगठन है और वही उनके लिए सुप्रीम नेता है।
*कौन मूल कौन भाजपाई इंपोर्टेड*
इसे आप संयोग कहे या कुछ और सीएमओ के पक्ष में चिट्ठी लिखने वाले तीनों माननीय किशोर अवस्था से ही संघ और भाजपा से जुड़े रहे हैं जबकि सीएमओ की खिलाफत करने वाले दोनों ही विधायक 2017 के आसपास भाजपा में शामिल हुए। दूसरे दलों से भाजपा में आए इन नेताओं को ही आयातित बताया गया है। लेकिन इसमें भी शायद युवा मोर्चा अध्यक्ष के पास जानकारी का अभाव है क्योंकि महेश त्रिवेदी भी शुरुआत में संघ और भाजपा से जुड़े रहे हैं। वर्ष 2002 में जब उन्हें टिकट नहीं मिला तब वह भाजपा छोड़ कानपुर देहात की राजपुर सीट से निर्दलीय चुनाव लड़े और जीते।
इन आयातित नेताओं ने दिलाईं लगातार हार वाली सीटें
युवा मोर्चा अध्यक्ष जिन नेताओं को आयातित बताकर तंज कस रहे हैं, इन्हीं दोनों की दम पर बीजेपी का झंडा उन सीटों पर लहराया जिन्हें वह कभी जीत नहीं पाई थी। बिठूर विधानसभा में भाजपा तीसरे नंबर की पार्टी थी जहां मुकाबला सपा बनाम कांग्रेस रहा। इसी प्रकार अस्तित्व में आने के बाद ब्राह्मण बहुल सीट होने के बाद भी अजय कपूर कांग्रेस पार्टी से विधायक बनने में सफल रहे थे जो कि वर्तमान समय में कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए हैं और उन्हें भी आयातित नेता कहा जा सकता है। महेश त्रिवेदी जब 2017 में बीजेपी के प्रत्याशी बने तब यह सीट पहली बार बीजेपी की झोली में आई।
डीएम सीएमओ विवाद में जाति की एंट्री
निलंबन के बाद सीएमओ डॉक्टर हरिदत्त नेमी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जिस प्रकार के आरोप लगाए ,उससे विपक्ष को सरकार पर हल्ला बोलने का मौका मिल गया। विपक्ष इस मुद्दे को लपक कर सरकार की ईमानदार छवि और सबका साथ सबका विकास नारे की काट कर रहा है। भाजपा की अंदरूनी लड़ाई ने विपक्ष को पीडीए की तलवार भांजने का सुनहरा अवसर उपलब्ध करा दिया।
स्वयं को पार्टी विद डिफरेंस बताने वाली भाजपा की कानपुर इकाई में हमेशा ही अनुशासनहीनता छाई रही है। जिसका सबसे बड़ा कारण नेताओं की गुटबाजी रही है। इसी गुटबाजी के चलते 2002 से 2012 तक भाजपा के लिए कानपुर वाटरलू का मैदान साबित हुआ। अमित शाह के उत्तर प्रदेश प्रभारी बनने के बाद कानपुर बीजेपी की गुटबाजी कुछ समय के लिए शांत हुई। लेकिन 2022 से भाजपा की यह पुरानी बीमारी फिर से उभरने लगी है। युवा मोर्चा दक्षिण अध्यक्ष अंकित गुप्ता जैसे पदाधिकारी इस गुटबाजी को नई धार देते नजर आ रहे हैं। मोदी, अमित शाह की नई भाजपा के विस्तार में इन कथित आयातित नेताओं का बड़ा योगदान है। कानपुर ही नहीं पूरे यूपी में और यूपी ही नहीं पूरे देश में भाजपा ने रणनीति बनाकर दूसरे दलों के प्रभावशाली नेताओं के लिए रेड कारपेट बिछाया और भाजपा के राजनीतिक वर्चस्व को स्थापित किया। स्थानीय नेता अपने बड़बोलेपन के चलते बीजेपी का बड़े स्तर पर नुकसान कर सकते हैं। क्योंकि यदि आयातित नेताओं की लिस्ट बनाई गई तो वह उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम बृजेश पाठक से होते हुए असम के मुख्यमंत्री तक जाएगी और विपक्ष को भाजपा पर हमला करने के और नए हथियार उपलब्ध कराएगी। समय रहते यदि कानपुर से उठ रही इस वैचारिक सुगबुगाहट को थामा नहीं गया तो आने वाले समय में भाजपा के अंदर यह मुद्दा बवंडर भी ला सकता है।
बयान
माननीय मुख्यमंत्री द्वारा उचित कार्रवाई की गई है।
*अभिनव शुक्ला “गोलू”
पार्षद वार्ड 66*
—पूरे विवाद पर हमें कुछ नहीं कहना है। अंकित गुप्ता की पोस्ट मैंने देखी नहीं है और इस पर वही बेहतर तरीके से बता सकते हैं।
*शिवराम सिंह अध्यक्ष भाजपा कानपुर दक्षिण*
*अंकित गुप्ता को स्वराज इंडिया कार्यालय से कई बार फोन किया गया लेकिन उठा नहीं। व्हाट्सएप पर किए गए मैसेज का जवाब नहीं दिया गया।*