
सनातन संस्कृति की गूढ़ शक्ति का आधुनिक अर्थ
धर्म अध्यात्म डेस्क/स्वराज इंडिया
भारत की समृद्ध तांत्रिक परंपरा में माँ प्रत्यङ्गिरा देवी का नाम उस दिव्य शक्ति के रूप में लिया जाता है जो न केवल रक्षा करती हैं, बल्कि नकारात्मकता को उसी दिशा में लौटा देती हैं जहाँ से वह उत्पन्न हुई होती है।उनके नाम में ही यह रहस्य छिपा है — “प्रति” अर्थात् विपरीत और “अंगिरा” अर्थात् ऊर्जा या अंग। इस प्रकार प्रत्यङ्गिरा वह चेतना हैं जो हर दुष्ट या असंतुलित प्रवाह को पलटकर संतुलन की दिशा में ले जाती हैं। माँ प्रत्यङ्गिरा हमें सिखाती हैं कि हर शक्ति का उत्तर उसी दिशा में छिपा होता है जहाँ से वह उत्पन्न हुई है।उनका तत्त्व हमें याद दिलाता है कि कोई भी ऊर्जा न तो शुभ होती है, न अशुभ — उसका परिणाम केवल दिशा पर निर्भर करता है।जब दिशा बदल दी जाती है, तो विनाशकारी शक्ति भी रक्षा का कवच बन जाती है — यही है माँ प्रत्यङ्गिरा का सनातन रहस्य। यह लेख सनातन संस्कृति की गूढ़ तांत्रिक परंपरा में निहित आध्यात्मिक विज्ञान को आधुनिक दृष्टि से प्रस्तुत करता है — एक प्रेरणा कि जीवन की हर नकारात्मक शक्ति को संतुलन और साधना से सकारात्मक बनाया जा सकता है। देवी प्रत्यङ्गिरा — तंत्र की अदृश्य परंतु सर्वोच्च शक्तितंत्रशास्त्र में उन्हें “वज्रावरण-शक्ति” कहा गया है — अर्थात् साधक के चारों ओर अदृश्य कवच निर्मित करने वाली शक्ति।जहाँ बगलामुखी देवी स्थम्भन (रोकने) की अधिष्ठात्री हैं, वहीं प्रत्यङ्गिरा उस स्थम्भन का विपरीत आयाम हैं — वे केवल रोकती नहीं, बल्कि दुष्ट प्रवाह को उसके मूल स्रोत में लौटा देती हैं।धूमावती जहाँ नाश और शून्यता की प्रतीक हैं, वहीं प्रत्यङ्गिरा उस नाश के भी नाश का कार्य करती हैं — संतुलन बनाए रखने वाली परा-शक्ति के रूप में।काली जब संहार की पराकाष्ठा पर पहुँचती हैं, तब उसी कालिक ऊर्जा को शमित करने वाली शक्ति प्रत्यङ्गिरा स्वरूपिणी कही जाती हैं। संतुलन की देवी — ऊर्जा के उलट प्रवाह का विज्ञानतांत्रिक ग्रंथों में प्रत्यङ्गिरा की तीन अवस्थाएँ बताई गई हैं —1. प्रत्यङ्गिरा – रक्षा करने वाली शक्ति2. विपरीत प्रत्यङ्गिरा – दुष्प्रभावों को पलटने वाली शक्ति3. महाविपरीत प्रत्यङ्गिरा – हर दिशा से आने वाली ऊर्जा को निष्क्रिय कर देने वाली परात्पर शक्तिइस रूप में वे केवल देवी नहीं, बल्कि संतुलन और आत्म-रक्षा की जीवंत चेतना हैं।
आधुनिक जीवन में प्रत्यङ्गिरा का महत्व
आज जब तनाव, नकारात्मक विचार और असुरक्षा का प्रभाव बढ़ रहा है, माँ प्रत्यङ्गिरा का तत्त्व पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।उनकी साधना का अर्थ केवल बाहरी शत्रुओं से रक्षा नहीं, बल्कि अपने भीतर के भय, क्रोध और विषाक्त प्रवृत्तियों को पहचानकर उन्हें निष्क्रिय करना है।यह आत्म-संयम और मानसिक स्थिरता का मार्ग है — जहाँ साधक किसी विपरीत परिस्थिति में भी अडिग रहता है।🔬 विज्ञान और तंत्र का संगमप्रत्यङ्गिरा का सिद्धांत आधुनिक विज्ञान के “energy balance” और न्यूटन के तीसरे नियम — “हर क्रिया की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है” — से मेल खाता है।जब कोई नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है, प्रत्यङ्गिरा का तत्त्व उसी क्षण विपरीत ऊर्जा प्रवाह बनाकर संतुलन स्थापित करता है।न्यूरो-विज्ञान की दृष्टि से भी यह “energy reversal” या neuro-regulation का सिद्धांत है — जहाँ व्यक्ति नकारात्मक विचारों से भागता नहीं, बल्कि उन्हें रूपांतरित करता है।


