
लगातार चुनावी हार और गिरते वोट प्रतिशत के बावजूद वे अभी भी मिशन 2027 को लेकर पूरी गंभीरता से तैयारी कर रही हैं
स्वराज इंडिया न्यूज ब्यूरो
लखनऊ।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में भले ही आज भाजपा और समाजवादी पार्टी आमने-सामने दिख रही हों, लेकिन बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने खुद को सियासी परिदृश्य से बाहर नहीं किया है। लगातार चुनावी हार और गिरते वोट प्रतिशत के बावजूद वे अभी भी मिशन 2027 को लेकर पूरी गंभीरता से तैयारी कर रही हैं।
2022 विधानसभा चुनाव में बसपा महज एक सीट पर सिमट गई और 2024 लोकसभा में खाता तक नहीं खुला। वोट प्रतिशत 13% से घटकर 9.39% तक आ गया। इसके बाद मायावती ने संगठन को नया जीवन देने की रणनीति अपनाई है। “एक बूथ, पांच यूथ” अभियान और गांव-गांव “भाईचारा कमेटी” बनाकर पार्टी कैडर को सक्रिय किया जा रहा है। पंचायत चुनावों को बसपा बड़ी कसौटी मान रही है। पार्टी का मानना है कि अगर स्थानीय चुनाव में पकड़ बनी तो विधानसभा चुनाव में भी ऑक्सीजन मिलेगी।
दलित वोट बैंक की चुनौती
बसपा की सबसे बड़ी दिक्कत उसका पारंपरिक वोट बैंक है। गैर-जाटव दलितों का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर खिसक गया है और जाटव वोटों में भी सेंधमारी हो चुकी है। वहीं, मुस्लिम और ओबीसी मतदाता समाजवादी पार्टी की तरफ ज्यादा झुकते दिखाई दे रहे हैं। यही वजह है कि मायावती अब फिर से 2007 वाला “सामाजिक समीकरण” खड़ा करने की कोशिश में हैं, जिसने उन्हें बहुमत की सरकार दी थी।
मायावती की राजनीति पर नजर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती राजनीति से थकी या मोहभंग की शिकार नहीं हैं, बल्कि वे सही मौके का इंतजार कर रही हैं। उनकी रणनीति “धीरे चलो, लेकिन सही समय पर चोट करो” जैसी दिखती है। हाल में आकाश आनंद जैसे नए चेहरों के जुड़ने से संगठन में नई ऊर्जा दिख रही है, मगर सवाल यह है कि क्या यह ऊर्जा दलित-ओबीसी-मुस्लिम गठजोड़ को फिर से मजबूती से जोड़ पाएगी?
मायावती का दांव साफ है—संगठन और सामाजिक इंजीनियरिंग के दम पर वापसी। पर असली परीक्षा 2027 के चुनाव होंगे। यदि बसपा अपने पारंपरिक वोटरों की वापसी कराने में सफल होती है और नए वर्गों का समर्थन जुटा पाती है, तो यूपी की राजनीति में उसका असर दोबारा देखा जा सकता है। फिलहाल यह साफ है कि मायावती राजनीति से बाहर नहीं हुईं, बस सही समय का इंतजार कर रही हैं।