Wednesday, February 4, 2026
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उत्तर प्रदेश में SIR से सवा करोड़ नाम कटने की आशंका

नोटिसों से गरीब और ग्रामीण मतदाता परेशान, भाजपा के कोर वोट बैंक पर भी असर की संभावना

स्वराज इंडिया ब्यूरो
लखनऊ।
उत्तर प्रदेश में चुनाव आयोग द्वारा चलाया जा रहा मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण अभियान तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन यह प्रक्रिया अब लाखों मतदाताओं के लिए संकट का कारण बनती जा रही है। जनवरी 2026 तक प्रदेश में करीब 1.25 करोड़ मतदाताओं के नाम कटने का खतरा बताया जा रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, इनमें से लगभग 75 प्रतिशत हिंदू मतदाता हैं, जिससे राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चिंता बढ़ गई है।
प्रदेश के प्रमुख जिलों लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, आगरा और प्रयागराज में अब तक 25 लाख से अधिक हिंदू मतदाताओं को नोटिस जारी किए जा चुके हैं। निर्वाचन विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन महीनों में ही करीब 8 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं, जिनमें 5.5 लाख हिंदू मतदाता बताए जा रहे हैं।
यह स्थिति न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रही है, बल्कि योगी आदित्यनाथ सरकार और भाजपा की आगामी चुनावी रणनीति के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनती नजर आ रही है।
नोटिसों से गरीब मतदाता दहशत में
चुनाव आयोग की ओर से भेजी जा रही नोटिसों ने आम मतदाताओं, खासकर गरीब और वंचित वर्ग के लोगों में दहशत फैला दी है। नोटिसों में मतदाता से नाम, पता, उम्र और अन्य विवरण सत्यापित करने के लिए कई प्रमाण-पत्र मांगे जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण अभियान अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनता जा रहा है।
सवाल यही है कि क्या सरकार और चुनाव आयोग समय रहते गरीब और ग्रामीण मतदाताओं को राहत देंगे, या फिर यह प्रक्रिया आगामी चुनावों में भाजपा के लिए बड़ा संकट बन जाएगी।

इनमें शामिल हैं…

हाईस्कूल प्रमाण पत्र
स्थायी निवास प्रमाण पत्र
बैंक पासबुक
जन्म प्रमाण पत्र
जीवन बीमा पॉलिसी
लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे ग्रामीण-प्रधान राज्य में करोड़ों लोग इन दस्तावेजों से वंचित हैं। असंगठित क्षेत्र के मजदूर, भूमिहीन किसान और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग इन कागजों की व्यवस्था करने में असमर्थ हैं।
विशेष रूप से स्थायी निवास प्रमाण-पत्र की मांग सबसे बड़ी समस्या बनकर सामने आई है, क्योंकि राज्य में ऐसा कोई व्यापक और स्पष्ट आधिकारिक प्रमाण पत्र जारी करने की व्यवस्था नहीं है।
पुराने मतदाताओं के लिए प्रक्रिया लगभग असंभव
1980-90 के दशक या उससे पहले जन्मे मतदाताओं के लिए यह प्रक्रिया और भी कठिन हो गई है। उस दौर में जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल रिकॉर्ड या बैंकिंग दस्तावेज गरीब परिवारों में आम नहीं थे।
सामान्य वर्ग के लोगों के पास जाति प्रमाण पत्र भी नहीं होता, जो अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए अनिवार्य है। ऐसे में नोटिस मिलने के बाद लोग तहसील, ब्लॉक कार्यालय और स्कूल रिकॉर्ड के चक्कर लगाने को मजबूर हैं।
मतदाता संगठनों का कहना है कि यह प्रक्रिया आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को असमान रूप से प्रभावित कर रही है। यूपी में 80 प्रतिशत से अधिक आबादी ग्रामीण है, जहां डिजिटल साक्षरता और दस्तावेजीकरण की भारी कमी है।

हिंदू मतदाताओं पर असंतुलित असर की चर्चा

सबसे अधिक चिंता इस बात को लेकर जताई जा रही है कि नोटिसों और संभावित कटौती का असर हिंदू मतदाताओं पर अधिक दिखाई दे रहा है, आंकड़ों के अनुसार— हिंदू नामों पर 75% कटौती का खतरा
मुस्लिम नामों में यह आंकड़ा लगभग 22% बताया जा रहा है
लखनऊ में ही करीब 2 लाख हिंदू मतदाताओं को नोटिस मिलने की बात सामने आ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हिंदू समाज ने कभी कल्पना नहीं की थी कि उसे अपने नागरिक होने का प्रमाण देना पड़ेगा, इसलिए कागजी दस्तावेजों को सहेजने की प्रवृत्ति कम रही।
इसके उलट, एनआरसी-सीएए जैसे विवादों के बाद मुस्लिम समुदाय में दस्तावेजों को लेकर सतर्कता बढ़ी है।
हालांकि, इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि अभी स्पष्ट रूप से सामने नहीं आई है, लेकिन चर्चा ने राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया है।

भाजपा के लिए चुनावी खतरा?

उत्तर प्रदेश भाजपा का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है। 2022 विधानसभा चुनाव में हिंदू एकजुटता ने योगी सरकार को दोबारा सत्ता दिलाई थी।
लेकिन यदि सवा करोड़ में से आधे नाम भी कट गए, तो भाजपा को आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में 40-50 लाख वोटों तक का नुकसान हो सकता है।
पूर्वांचल, अवध और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में हिंदू बहुल सीटों पर सीधा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
विपक्षी दल सपा, बसपा और कांग्रेस इसे “हिंदू मतदाताओं के अधिकारों पर हमला” बताकर मुद्दा बनाने की तैयारी में हैं।
सरकार से हस्तक्षेप की मांग
मतदाता संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार से तुरंत कदम उठाने की मांग की है। सुझाव दिए जा रहे हैं कि—
बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) को और सक्रिय किया जाए
मोबाइल दस्तावेजीकरण वैन शुरू की जाए
राशन कार्ड, परिवार रजिस्टर जैसे वैकल्पिक प्रमाणों को मान्यता मिले
स्थायी निवास प्रमाण पत्र की व्यवस्था की जाए
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि गरीब और वंचित वर्ग का मताधिकार सुरक्षित नहीं हुआ, तो यह लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर देगा।

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