
15 बड़े अफसरों पर केस, सियासत ने फिर ओढ़ लिया जातिवाद का चोला
स्वराज इंडिया ग्राउंड विशेष रिपोर्ट/नई दिल्ली।
हरियाणा का प्रशासनिक गलियारा इन दिनों हिल गया है — जब एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी वाई. पूरन कुमार ने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। 7 अक्टूबर को चंडीगढ़ सेक्टर-11 स्थित अपने सरकारी आवास में हुई यह घटना सिर्फ़ एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर पल रहे जातिवाद, अहंकार और सत्ता के खेल की परतें खोलती नज़र आ रही है।मृतक आईपीएस पूरन कुमार का 8 पन्नों का सुसाइड नोट पूरे सिस्टम पर सवाल उठाता है। उन्होंने साफ़ लिखा कि उन्हें लंबे समय से “जातिगत भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न” का सामना करना पड़ा। लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकती —आईपीएस की पत्नी, आईएएस अधिकारी अमनीत पी. कुमार ने एफआईआर दर्ज कराने के लिए चंडीगढ़ के सेक्टर-11 थाने में तहरीर दी। उन्होंने साफ कहा — “जब तक दोषियों पर केस दर्ज नहीं होगा, पोस्टमार्टम नहीं होने दूंगी।”दबाव बढ़ा तो मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने एडवोकेट जनरल और वरिष्ठ अधिकारियों से तात्कालिक चर्चा की।इसके बाद डीजीपी शत्रुजीत कपूर, एसपी रोहतक नरेंद्र बिजारणिया समेत 14 शीर्ष अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई।एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और एससी/एसटी एक्ट की धाराएं 3(5) और 3(1)(R) लगाई गई हैं।

वरिष्ठ अधिकारियों के नाम शामिल
हरियाणा के डीजीपी शत्रुजीत कपूर, डीजीपी अमिताभ ढिल्लोंएडीजीपी (1997 बैच) संजय कुमारआईजीपी (2007 बैच) पंकज नैनआईपीएस (1994 बैच) कला रामचंद्रनआईपीएस (1995 बैच) संदीप खिरवारआईपीएस (1999 बैच) सिबाश कविराजपूर्व डीजीपी (1988 बैच) मनोज यादवपूर्व डीजीपी (1988 बैच) पी.के. अग्रवालआईएएस (1988 बैच) टी.वी.एस.एन. प्रसादपूर्व एसीएस राजीव अरोड़ाएसपी, रोहतक नरेंद्र बिजारणियाआईजी, मधुवन कुलविंदर सिंहएडीजीपी, करनाल रेंज माटा रवि किरन
अब सवाल उठ रहे हैं —
क्या सच में एक उच्चपदस्थ आईपीएस अधिकारी सिर्फ जातिगत अपमान से टूट गया? या फिर यह मामला किसी बड़े घोटाले या प्रशासनिक टकराव से जुड़ा है, जिसे अब ‘जातिवाद’ का रंग दिया जा रहा है?राजनीतिक पारा चरम परबीजेपी, कांग्रेस, सपा, लोजपा और आम आदमी पार्टी — सभी ने इस आत्महत्या को “ब्राह्मणवादी मानसिकता” से जोड़ दिया। लेकिन हकीकत यह है कि जिन 15 अफसरों पर एफआईआर हुई है, उनमें एक भी ब्राह्मण नहीं है।फिर भी ‘ब्राह्मणवाद’ और ‘मनुवाद’ जैसे शब्दों का राजनीतिक इस्तेमाल तेज़ी से हो रहा है। सवाल है कि क्या हर प्रशासनिक विवाद को अब वोट बैंक की राजनीति में झोंक दिया जाएगा?सामान्य वर्ग के खिलाफ बढ़ती नफ़रत अब एक खतरनाक सामाजिक रोग बन चुकी है।पूरन कुमार की आत्महत्या से ज़्यादा शोर इस बात पर है कि किस जाति की मानसिकता जिम्मेदार है।जबकि जांच एजेंसियों को यह देखना चाहिए कि क्या उन्होंने किसी बड़े घोटाले या दबाव का पर्दाफाश करने की कोशिश की थी?



