लेफ्ट यूनिटी ने चारों केंद्रीय पद जीते, एबीवीपी को बड़ा झटका
छात्र राजनीति में मुद्दों की जीत
रणनीति ने तय की जीत, नारे नहीं अध्यक्ष बनीं अदिति मिश्रा

नई दिल्ली, स्वराज इंडिया ब्यूरो
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) छात्रसंघ चुनाव 2025 के नतीजों ने एक बार फिर इतिहास दोहरा दिया है। वामपंथी छात्र संगठनों के साझा गठबंधन लेफ्ट यूनिटी ने इस बार चारों केंद्रीय पदों — अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव पर प्रचंड जीत दर्ज कर ली।
वहीं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) को एक भी केंद्रीय पद पर जीत न मिलना, उसके लिए पिछले वर्षों में सबसे बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
अध्यक्ष पद पर लेफ्ट यूनिटी की उम्मीदवार अदिति मिश्रा ने बड़ी जीत हासिल कर सबका ध्यान खींचा। स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज की शोधार्थी अदिति ने चुनाव प्रचार के दौरान फीस वृद्धि, शोध छात्रवृत्ति, हॉस्टल सुविधाएँ और छात्र सुरक्षा जैसे सीधे मुद्दों को केंद्र में रखा।
अदिति ने मतदान से पहले कहा था कि “यह संघर्ष शिक्षा को सबके लिए सुलभ रखने का है, न कि विचारधारा थोपने का।”
उनकी यह बात छात्रों के बीच गूंज बनकर उभरी।
दूसरी ओर एबीवीपी की उम्मीदवार तन्या कुमारी ने राष्ट्रवाद और अनुशासन पर जोर दिया, लेकिन उनका संदेश छात्रों के जमीनी मुद्दों से उतना नहीं जुड़ पाया। वहीं,
बढ़ती महंगाई, शिक्षा का निजीकरण और रोजगार की कमी ने छात्रों को सीधे प्रभावित किया है। इन मुद्दों ने युवाओं को विचारधारा से ज्यादा व्यावहारिक नेतृत्व की ओर मोड़ा।

इस बार विचार नहीं, काम की राजनीति
पिछले वर्षों में कैंपस बहसें अक्सर “देशविरोध बनाम राष्ट्रवाद” जैसे एजेंडा आधारित विषयों पर सिमट जाती थीं, लेकिन इस चुनाव में हवा बदली। इस बार बहसें केंद्रित रहीं—
- हॉस्टल फीस
- लैब और शोध फंड
- छात्र समस्याओं पर पारदर्शिता
मतदान प्रतिशत 67% रहा, जो संकेत देता है कि छात्र अब ‘काम करने वाले नेतृत्व’ को चुनना चाहते हैं। लेफ्ट यूनिटी ने कैंपेन को क्लास-टू-क्लास बातचीत, कैफे चर्चाओं और सोशल मीडिया संवाद तक ले जाकर छात्रों को सीधे जोड़ा। जबकि एबीवीपी अपनी पारंपरिक शैली — रैलियों और नारों — तक सीमित दिखाई दी।

जेएनयू का प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति तक
जेएनयू के चुनाव परिणाम केवल एक विश्वविद्यालय की दिशा तय नहीं करते, बल्कि देशभर में छात्र राजनीति के संकेत माने जाते हैं। पिछले कुछ महीनों में एबीवीपी को हैदराबाद और एएमयू में भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली, वहीं दिल्ली यूनिवर्सिटी में उसकी जीत दर्ज हुई थी। जेएनयू में लेफ्ट की यह क्लीन स्वीप छात्र राजनीति के बदलते समीकरणों का साफ संदेश है—
युवाओं का झुकाव मुद्दों और संवेदनाओं की राजनीति की ओर है।
नतीजे आते ही पूरा जेएनयू “लाल सलाम” के नारों से गूंज उठा। रात भर जश्न चलता रहा। वहीं एबीवीपी कार्यकर्ता शांत दिखे। संगठन के पदाधिकारियों ने इसे “चिंतन का अवसर” बताया और कहा कि वे पार्षद स्तर पर मिली सीटों से संगठन को फिर मजबूत करेंगे।
2019–2025: बदलाव की बहार
वर्ष जेएनयू छात्र राजनीति का ट्रेंड
2019 एबीवीपी का उभार शुरू
2020–23 वैचारिक संघर्ष और ध्रुवीकरण
2024 कैंपस में असंतोष, मुद्दा आधारित राजनीति की शुरुआत
2025 लेफ्ट यूनिटी की वापसी — संगठित रणनीति


