मरी माता मंदिर: यहां गिरा था माता सती का अंश
भक्तों की मान्यता है कि असाध्य रोगों से मुक्ति देती है मरी माता
कुँवर समीर शाही/स्वराज इंडिया
अयोध्या। पुण्य सलिला सरयू नदी के किनारे गुप्तारघाट स्थित मरी माता देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। यहां सिंहासन पर विराजी मां का भव्य रूप हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां नवरात्र के मौके पर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ जुटती है। आदि शक्ति श्री मरीमाता मंदिर के महंथ चन्द्र शेखर त्रिपाठी कहते हैं कि प्राचीन मान्यता है कि जब भगवान शंकर ने माता सती के शरीर को लेकर ताण्डव किया था। उस समय भगवान विष्णु ने भगवान शंकर की सती के प्रति मोह को समाप्त करने का प्रयास किया था। उस समय माता का एक अंश इस स्थान पर गिरा था।लोग वर्षों से इस स्थान को मरी माता नाम से पूजते चले आ रहे है। मान्यता है कि दूसरी जगह से जवाब पा चुके असाध्य रोगों के तमाम मरीज मां की कृपा से स्वस्थ हो चुके हैं। इनमें सफेद दाग, लकवा और कैंसर तक के मरीज शामिल बताये जाते हैं।
शारदीय व चैत्र नवरात्र पर दुर्गा सप्तशती पाठ, सामूहिक यज्ञ और भोज के लिए मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। सिर्फ धूप, कपूर और अगरबत्ती से प्रसन्न होने वाली मां के इस दरबार में प्रत्येक सोमवार व शुक्रवार को भी भक्त जुटते हैं। श्रावण मास के शुक्लपक्ष में हजारों लोग कड़ाही चढ़ाने मंदिर पहुंचते हैं।
महंत चंद्रशेखर त्रिपाठी मंदिर को ऐतिहासिक और पुरातन काल का बताते हैं। कहते हैं कि पहले इस स्थान पर माता के रूप में सिर्फ एक पिंड था। ये पिंड हजारों वर्ष पुराना था। पिंड कहां से आया, किसने और कब रखवाया? किसी को नहीं मालूम। वे कहते हैं, करीब डेढ़ सौ साल पहले की बंदोबस्ती व फैजाबाद गजेटियर में भी ‘मरी माता’ का जिक्र है।
पिंड की जगह भव्य मंदिर बनवाने की कवायद वर्ष 2002 में शुरू हुई जो आज भी किश्तों में जारी है। मंदिर के बाहर दाहिनी तरफ बाल रूप बालाजी तो बायीं ओर गणेश जी की मूर्ति है। महंत ने बताया कि एक रात उन्हें स्वप्न आया कि माता शीत, धूप और बरसात सह रही हैं, वहां मंदिर क्यों नहीं बनवा देता? आंख खुली तो इसी पर मंथन करने लगा। प्रण किया कि जब तक मंदिर निर्माण नहीं होता दाढ़ी-बाल पर उस्तरा नहीं चलेगा। ‘मरी माता’ की कृपा ऐसी कि पास में धेला न होते हुए भी इस काम के लिए सारा सामान कहां से आने व मंदिर बनने लगा, पता ही नहीं चला।
