
(आलेख : संजय पराते)
इंडिया समूह की ओर से उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने के बाद जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी भाजपा के निशाने पर है। उन पर आरोप लगाया जा रहा है कि छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा के लिए वे जिम्मेदार है, क्योंकि उन्होंने ही छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार द्वारा प्रायोजित सलवा जुडूम पर रोक लगाई थी। इस हिंसक आंदोलन में जो अमानवीय ज्यादतियां हुई थी, उसमें 650 गांवों को जबरन खाली करवाया गया था और इस मुहिम में दर्जनों गांवों को जलाया गया था, सैकड़ों महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था और सैकड़ों की हत्याएं। एक लाख से ज्यादा लोग अपने घरों और गांवों से विस्थापित हुए थे और आज भी हजारों लोग लापता है। नक्सलियों के नाम पर पुलिस और अर्ध सैनिक बलों द्वारा ग्रामीणों का बड़े पैमाने पर जन संहार किया गया था, जिसकी पुष्टि सीबीआई, मानवाधिकार आयोग और अनुसूचित जनजाति आयोग ने अपनी विभिन्न जांच रिपोर्टों में की थी, लेकिन आज तक इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों को दंडित नहीं किया गया। आदिवासी बच्चों और पूर्व नक्सली तत्वों को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनाया गया था और इस प्रकार आदिवासियों को आदिवासियों के खिलाफ ही खड़ा किया गया था। और यह सब किया गया था बस्तर की प्राकृतिक संपदा की कॉर्पोरेट लूट को आसान बनाने के लिए। सलवा जुडूम पर रोक के बाद भी लूट की यह मुहिम बदस्तूर जारी है और आदिवासियों के उत्पीड़न और उनके मानवाधिकारों के हनन में कोई कमी नहीं आई है। इसके नतीजे में, वर्ष 2011 की जनगणना में बस्तर में आदिवासियों की आबादी में 2% से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई है।
जस्टिस सुदर्शन ने अपने एक बयान में स्पष्ट किया है कि सलवा जुडूम पर दिया गया फैसला सुप्रीम कोर्ट का था, न कि उनका व्यक्तिगत। उन पर भाजपा द्वारा किए जा रहे हमले के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के सलवा जुडूम पर दिए गए फैसले को सार संक्षेप में याद करना उपयोगी होगा, क्योंकि जिस पार्टी का संविधान और संवैधानिक फैसलों पर कोई विश्वास नहीं है, वह न लोकतंत्र की रक्षा कर सकती है और न मानवाधिकारों का सम्मान। भाजपा आज केवल कॉरपोरेट पूंजी के हाथ का हथियार बनकर रह गई है।
सुप्रीम कोर्ट की इस विवेचना ने राज्य की भाजपा सरकार की उन जनविरोधी नीतियों को बेनकाब कर दिया था, जो नक्सलवाद के दमन के नाम पर आमतौर पर आदिवासियों के दमन, उनके मानवाधिकारों के हनन तथा बस्तर की भूगर्भीय संपदा की लूट के लिए अपनाई जा रही है। सुप्रीम कोर्ट का सीधा प्रहार सरकार की नवउदारवादी तथा वैश्वीकरण जनित नीतियों पर था, जिसकी ‘‘लागत’’ तो गरीबों से वसूली जा रही है, लेकिन ‘‘इसके फायदों के बड़े हिस्से पर समाज के प्रभुत्वशाली तबके का कब्जा’’ हो रहा है। अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने योजना आयोग द्वारा गठित विषेशज्ञों के समूह की ‘उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास की चुनौतियां’ नामक रिपोर्ट को उद्धृत किया है — ‘‘इस कारण इन्हें (आदिवासियों को) अनिवार्य रुप से विस्थापन का सामना करना पड़ा है … इसने उनके सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक पहचान और संसाधनों को नष्ट किया है।…. इन सबका मकसद इनके संसाधनों पर कब्जा करना और वंचित लोगों की गरिमा का हनन करना है।’’ (पैरा-6). प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमित भादुड़ी के हवाले से विकास के इस प्रतिमान को ‘विकास आतंकवाद’ करार देते हुए कोर्ट ने उद्धृत किया है — ‘‘इसमें राज्य के विकास के नाम पर गरीबों के खिलाफ लगातार हिंसा की जा रही है। राज्य मुख्य रुप से कार्पोरेट अभिजात तंत्र के हित में काम कर रहा है। इस काम में इसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक के साथ ही साथ स्वार्थी राजनैतिक वर्ग का समर्थन भी मिला हुआ है। राजनीतिक समूहों द्वारा इस विकास आतंकवाद को ही प्रगति बताया जा रहा है। …. ‘विकास आतंकवाद’ का सामना करने वाले गरीब अपने सीधे प्रतिरोध से इसे नकार देंगे।’’ (पैरा- 14).
देश के कथित विकास के लिए और प्राकृतिक संसाधनों के प्रभुत्वशाली वर्ग के पक्ष में दोहन तथा ऊंची विकास दर सुनिश्चित करने के लिए जो नीतियां अपनाई जा रही हैं, उससे वंचितों और उपेक्षितों तथा मानवीय गरिमा से च्युत लोगों की संख्या बहुत बड़े पैमाने पर बढ़ी है। जिस ऊंची आर्थिक संवृद्धि तथा विकास दर की बात की जा रही है, उसने केवल और केवल, आय के असमान वितरण को ही सुनिश्चित किया है। पूरे देश में चल रही भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया और इसके खिलाफ जनांदोलनों के उभार से भी यही बात स्पष्ट होती है। कोर्ट ने यह माना है कि 1950-1990 के दौरान 213 लाख लोगों को विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित होना पड़ा है, जिसमें केवल आदिवासियों की संख्या ही 40 प्रतिशत (85 लाख) थी, लेकिन इनमें से केवल 25 प्रतिशत लोगों का ही पुनर्वास किया गया। लेकिन यह फंड-बैंक समर्थित नई आर्थिक नीतियों के लागू किये जाने से पहले के आंकड़े हैं। 1990 के बाद उदारीकरण व वैश्वीकरण की जिन नीतियों को लागू किया जा रहा है, उसके चलते वर्तमान में संख्या अवश्य ही दुगुनी से अधिक हो चुकी होगी। यही ‘वैश्वीकरण का काला पक्ष’ है, जो संपन्न तबकों के चंद लोगों के लिए अधिकांश वंचितों — और इनमें से लगभग सभी आदिवासी, दलितों तथा आर्थिक रुप से कमजोर तबके के लोग ही हैं — की बलि मांगता है। इसीलिए कोर्ट की टिप्पणी है कि भारतीय राज्य ने ‘‘जिस झूठे विकास प्रतिमान को बढ़ावा दिया है, उसका कोई मानवीय चेहरा नहीं है।’’ (पैरा- 14). ‘‘राज्य ने सीधे तौर पर संवैधानिक मानकों और मूल्यों का उल्लंघन करके पूंजीवाद के लुटेरे रुपों को समर्थन और बढ़ावा दिया है।’’ (पैरा- 12).


