
हरियाणा में आईपीएस अधिकारी पूरन कुमार की संदिग्ध मौत के बाद उनके परिवार से मुलाकात करते हुए राहुल गांधी ने कहा— “अगर आप दलित हैं, तो आपको कुचला जा सकता है, फेंका जा सकता है।”
पूरन कुमार प्रकरण पर फिर उभरा कांग्रेस का दोहरा चेहरा
मुख्य संवाददाता स्वराज इंडिया
हरियाणा।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी एक बार फिर जातिवाद की राजनीति के आरोपों में घिर गए हैं। हरियाणा में आईपीएस अधिकारी पूरन कुमार की संदिग्ध मौत के बाद उनके परिवार से मुलाकात करते हुए राहुल गांधी ने कहा— “अगर आप दलित हैं, तो आपको कुचला जा सकता है, फेंका जा सकता है।” इस बयान ने न सिर्फ राजनीतिक हलचल मचा दी, बल्कि यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ कि क्या राहुल गांधी वाकई सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं या फिर सत्ता के लिए समाज को जातियों में बांटने की पुरानी कांग्रेस नीति को दोहरा रहे हैं?
पूरन कुमार, एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी माने जाते थे। उनकी मौत को लेकर जांच जारी है, लेकिन राहुल गांधी ने मौके का फायदा उठाते हुए इसे दलित बनाम गैर-दलित मुद्दा बना दिया। भाजपा सहित कई दलों ने राहुल पर जातीय आग भड़काने और दलितों की भावनाओं से खेलने का आरोप लगाया है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी हर बार किसी भी घटना को जाति और धर्म के चश्मे से देखते हैं, ताकि समाज में विभाजन पैदा कर राजनीतिक लाभ उठा सकें।
पूरन कुमार प्रकरण के बहाने राहुल गांधी ने एक बार फिर खुद को “दलितों के मसीहा” के रूप में पेश करने की कोशिश की है, लेकिन विरोधियों का मानना है कि यह संवेदनशील मुद्दों का राजनीतिक दोहन मात्र है।
सच्चाई यह है कि सत्ता की राजनीति में राहुल गांधी लगातार वही रास्ता अपनाते दिख रहे हैं, जिस पर कांग्रेस ने दशकों तक जाति और धर्म के नाम पर समाज को बाँटा।
पूरन कुमार जैसे संवेदनशील मामलों में राजनीति करने से कांग्रेस को भले ही कुछ समय के लिए सुर्खियाँ मिलें, पर देश की सामाजिक एकता और साम्प्रदायिक सद्भाव को इससे गहरी चोट पहुँचती है।
कांग्रेस की “वोट बैंक राजनीति” का पुराना फार्मूला
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राहुल गांधी का यह बयान कांग्रेस की उसी पुरानी रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत इंदिरा गांधी के दौर से लेकर सोनिया गांधी तक ने समाज के वंचित वर्गों को चुनावी मोहरे की तरह इस्तेमाल किया।
1970 के दशक में इंदिरा गांधी ने “गरीबी हटाओ” के नारे के जरिए गरीबों और दलितों को साधा, तो अब राहुल गांधी “सामाजिक न्याय” के नाम पर वही राजनीति दोहरा रहे हैं।
कांग्रेस हर दौर में खुद को दलित-पिछड़े वर्गों की हितैषी बताती रही है, लेकिन सत्ता में रहते हुए न तो उसने जातीय भेदभाव खत्म किया, न ही दलितों की स्थिति में वास्तविक सुधार लाया।

विरोधाभासों से भरी राहुल गांधी की राजनीति
राहुल गांधी अक्सर दलित और वंचित तबकों के साथ दिखते हैं, लेकिन जब अत्याचार किसी अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा होता है, तब वे मौन रहते हैं। यही दोहरा रवैया उनकी राजनीति पर सवाल खड़े करता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि राहुल का मकसद पीड़ितों को न्याय दिलाना कम, बल्कि भावनात्मक माहौल बनाकर राजनीतिक सहानुभूति बटोरना ज्यादा है।
भाजपा ने किया पलटवार
भाजपा नेताओं ने राहुल गांधी को निशाने पर लेते हुए कहा है कि कांग्रेस नेता समाज में “जातीय जहर घोलने” का काम कर रहे हैं। हर बार चुनाव नजदीक आते ही कांग्रेस नेतृत्व दलित-पिछड़ा कार्ड खेलता है, ताकि सत्ता की कुर्सी तक पहुंच सके।
भाजपा प्रवक्ता ने कहा — “राहुल गांधी को केवल दलितों का दर्द तब दिखता है, जब इससे राजनीतिक फायदा हो। कांग्रेस ने 70 साल में गरीबों को सिर्फ वोट बैंक बनाया, न कि उनके जीवन में कोई वास्तविक बदलाव।”


