
स्वराज इंडिया ब्यूरो नई दिल्ली। भारत की भाषाई विविधता कभी भी केवल संवाद का जरिया नहीं रही, बल्कि यह उस सभ्यतागत चेतना का विस्तार है जिसने हज़ारों वर्षों से इस उपमहाद्वीप को एक सूत्र में पिरोए रखा है। अक्सर यह कहा जाता है कि भारत में हर कोस पर पानी और चार कोस पर वाणी बदल जाती है, लेकिन इस बदलाव के भीतर जो अंतर्धारा बहती है, वह ‘एकता’ की है। आज जब हम 2026 के मुहाने पर खड़े होकर अपनी भाषाई विरासत को देखते हैं, तो स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने उस औपनिवेशिक हीनभावना को तोड़ने का साहस दिखाया है जिसने दशकों से हमारी मातृभाषाओं को दोयम दर्जे पर धकेल रखा था। भारत के भाषाई परिदृश्य में आए इस बदलाव को केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि उस नई पीढ़ी के आत्मविश्वास से समझा जा सकता है जो अब अपनी भाषा में ‘रॉकेट साइंस’ समझने का सपना देख रही है।
जनसांख्यिकीय दृष्टि से देखें तो भारत की भाषाई विविधता दुनिया में सबसे अनूठा है। 2024-25 के नवीनतम अनुमानों के अनुसार, हिंदी बोलने वालों की संख्या जहाँ 60 करोड़ के आंकड़े को पार कर चुकी है, वहीं बंगाली, मराठी, तेलुगु और तमिल जैसी भाषाएं वैश्विक मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। यह महज संयोग नहीं है कि अलग-अलग भाषा परिवारों से होने के बावजूद भारतीय भाषाओं का व्याकरणिक ढांचा और उनकी अभिव्यक्ति का ढंग एक जैसा है। चाहे वह वाक्य में क्रिया का अंत में आना हो या फिर ध्वनियों का विशिष्ट उच्चारण, कश्मीरी से लेकर कन्याकुमारी तक एक ही भाषाई चेतना प्रवाहित होती है। इसी चेतना को नई शिक्षा नीति ने अपना मुख्य आधार बनाया है। नीति का यह तर्क पूरी तरह वैज्ञानिक है कि एक बच्चा अपनी मातृभाषा में अवधारणाओं को जितनी गहराई और स्पष्टता से समझ सकता है, वह किसी विदेशी भाषा में संभव नहीं है। प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की अनिवार्यता ने न केवल शिक्षा के लोकतंत्रीकरण का मार्ग प्रशस्त किया है, बल्कि उन करोड़ों ग्रामीण प्रतिभाओं के लिए भी दरवाजे खोल दिए हैं जो केवल भाषा की बाधा के कारण पीछे छूट जाती थीं।
शिक्षा नीति का सबसे दूरगामी और सकारात्मक प्रभाव उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दिखाई दे रहा है। दशकों तक यह माना जाता रहा कि चिकित्सा और इंजीनियरिंग जैसी जटिल पढ़ाई केवल अंग्रेजी में ही संभव है, लेकिन आज मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और दक्षिण के राज्यों में भारतीय भाषाओं में शुरू हुए तकनीकी पाठ्यक्रम इस मिथक को ध्वस्त कर रहे हैं। जब एक छात्र अपनी मूल भाषा में शरीर विज्ञान या टेक्नोलॉजी को पढ़ता है, तो उसकी मौलिक सोच का विस्तार होता है। यह भाषाई पुनर्जागरण का ही परिणाम है कि अब ज्ञान का सृजन केवल अनुवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय भाषाओं में मौलिक शोध को बढ़ावा मिल रहा है। इसके साथ ही, त्रि-भाषा सूत्र में आए लचीलेपन ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नए सेतु निर्मित किए हैं। जब उत्तर भारत का कोई युवा तमिल या कन्नड़ सीखता है और दक्षिण का छात्र हिंदी या बांग्ला के साहित्य से जुड़ता है, तो वह ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के उस संकल्प को चरितार्थ करता है जो केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और भाषाई है।
तकनीक और डिजिटल क्रांति ने इस भाषाई महासूत्र को और अधिक सशक्त बना दिया है। केंद्र सरकार का ‘भाषिणी’ मिशन और एआई-आधारित अनुवाद उपकरण आज उस दूरी को पाट रहे हैं जो सदियों से बनी हुई थी। आज एक किसान अपनी स्थानीय बोली में बोलकर इंटरनेट से संवाद कर सकता है, और एक तमिल विद्वान का शोध पत्र एआई की मदद से तत्काल हिंदी या ओडिया भाषी छात्र के लिए सुलभ हो जाता है। यह ‘क्षैतिज अनुवाद’ की शक्ति है जिसने अंग्रेजी की मध्यस्थता को कम करते हुए भारतीय भाषाओं को आपस में सीधे संवाद करने के योग्य बनाया है। संस्कृत और तमिल जैसी प्राचीन शास्त्रीय भाषाओं को मुख्यधारा की शिक्षा और तकनीक से जोड़ना इस नीति की एक और बड़ी उपलब्धि है, जिसने हमारे प्राचीन ज्ञान विज्ञान को आधुनिक नवाचारों के साथ संतुलित किया है।
भारतीय भाषाओं का यह नया युग केवल अक्षरों का समूह नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के आत्मविश्वास की वापसी है। नई शिक्षा नीति ने भाषाओं को केवल संवाद का माध्यम मानने के बजाय उन्हें पहचान और विकास का गौरव बनाया है। क्षेत्रीयता के छोटे विवादों से ऊपर उठकर, जब हम अपनी भाषाई विविधता को अपनी सबसे बड़ी शक्ति के रूप में स्वीकार करते हैं, तभी एक विकसित भारत की नींव मजबूत होती है। भाषाएं हमारी सभ्यता की धड़कनें हैं; यदि ये धड़कती रहेंगी, तो भारत की सांस्कृतिक अखंडता अक्षुण्ण रहेगी। आज की आवश्यकता इस भाषाई स्वाभिमान को बनाए रखने की है, क्योंकि अपनी भाषा को खोना केवल शब्दों को खोना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से उखड़ जाना है।

प्रो. दिनेशचन्द्रराय, कुलपति, बीआरए बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, बिहार।


