नंबर-13 पिलर की कहानी आज भी रूह कंपा देती है”
एक पुल, जिसकी नींव में दबी है इलाहाबाद की विरासत और रहस्य
स्वराज इंडिया : न्यूज ब्यूरो / इलाहाबाद (प्रयागराज)
तीन नदियों की त्रिवेणी से घिरे प्रयागराज की पहचान सिर्फ संगम और कुंभ से नहीं, बल्कि उन ऐतिहासिक इमारतों से भी है, जो शहर की बुनियाद में आज भी सांसें ले रही हैं। उन्हीं में से एक है नैनी ब्रिज, जो न सिर्फ भारत का सबसे पुराना स्टील ट्रस ब्रिज है, बल्कि 160 सालों से इतिहास, इंजीनियरिंग और रहस्यों का पुल भी है।
यह डबल-डेक स्टील ट्रस ब्रिज 1865 में यमुना नदी पर बनकर तैयार हुआ। 3150 फीट लंबा यह पुल ब्रिटिश काल के इंजीनियरिंग कौशल की मिसाल है। इसका ऊपरी डेक दो लेन की रेलवे लाइन लिए हुए है, जिस पर दिल्ली-हावड़ा जैसे व्यस्त रेलमार्ग गुजरते हैं। नीचे का डेक 1927 से सड़क परिवहन के लिए खुला है।
पुल को डिजाइन किया था मशहूर इंजीनियर अलेक्जेंडर मीडोज रेंडेल और उनके पिता जेम्स मीडोज रेंडेल ने, जबकि निर्माण कार्य की कमान ब्रिटिश इंजीनियर मिस्टर सिवले ने संभाली थी। पुल की नींव 42 फीट गहरी है और इसके निर्माण में 30 लाख क्यूबिक ईंट व गारा और 4300 टन लोहा इस्तेमाल हुआ था। निर्माण पर खर्च हुए थे उस दौर में 44 लाख 46 हजार रुपए।
13 नंबर पिलर: एक रहस्य, एक किंवदंती
इस पुल के 17 पिलरों में सबसे चर्चित और रहस्यमयी है पिलर नंबर 13, जो यमुना की सबसे गहरी धारा में स्थित है। इस पिलर को बनाने में इंजीनियरों के पसीने छूट गए। दिनभर तैयार किया गया प्लेटफॉर्म रात में बह जाता। कोई भी डिज़ाइन टिक नहीं पा रहा था। कहते हैं कि जब सिवले को लगातार असफलता मिल रही थी, तभी उन्होंने एक सपना देखा – उनकी पत्नी पानी में खड़ी हैं, ऊँची हील वाली सैंडल पहने हुए और पानी उसे काटकर निकल रहा है।
सपने से प्रेरणा लेकर सिवले ने जूते के आकार की डिज़ाइन बनाई, जो पानी को चीरती हुई टिक सकी। यही डिज़ाइन बनी हाथी पांव जैसे दिखने वाले पिलर की, जिसे बनाने में 20 महीने से ज्यादा का समय लगा।
लेकिन कहानियां यहीं नहीं रुकतीं…
मानव बलि की दहला देने वाली दास्तान
स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, पिलर नंबर 13 तब तक नहीं बन सका जब तक कि यमुना नदी में एक मानव बलि नहीं दी गई। बताया जाता है कि एक तीर्थ पुरोहित की सलाह पर ये बलि दी गई, तब जाकर पिलर का काम पूरा हुआ। आज भी कई लोगों का दावा है कि रात के अंधेरे में इस पिलर पर वह आत्मा बैठी दिखाई देती है।
जामा मस्जिद के पत्थर और 1857 की क्रांति
इस पुल में प्रयागराज की मुगल विरासत भी छिपी है। 1857 की क्रांति के बाद मौलवी लियाकत अली की शहादत के बाद अंग्रेजों ने अकबर द्वारा बनवाई गई जामा मस्जिद को गिरवा दिया और उसके पत्थर इस पुल के पिलरों में लगाए गए। उस मस्जिद में 10 हज़ार लोग एक साथ नमाज पढ़ सकते थे।
रहस्य से घिरे स्थल
इस पुल के पास स्थित इलाहाबाद डिग्री कॉलेज के पास का हंटेड हाउस और इलाहाबाद एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट भी रहस्य और डरावनी घटनाओं के लिए मशहूर हैं। नैनी रेलवे स्टेशन को भी भूतहा स्टेशन कहा जाता है, जहां रात्रि में वह मानव आत्मा देखे जाने की बात कही जाती है।
160 साल बीत जाने के बाद भी नैनी ब्रिज आज भी हर दिन सैकड़ों ट्रेनों और वाहनों का भार उठाता है। यह सिर्फ एक पुल नहीं, बल्कि भारत के इंजीनियरिंग इतिहास, बलिदान और अनकहे रहस्यों का जीवित दस्तावेज है।