Friday, February 13, 2026
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मिशन 2027: टोटी चोरी से वोट चोरी तक, यूपी में नेताओं की खींचतान तेज

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अखिलेश यादव की रणनीति दरअसल दोहरी है—एक तरफ वह शिक्षा, बेरोजगारी और किसानों की समस्याओं जैसे मुद्दे उठा रहे हैं,

अनूप अवस्थी, स्वराज इंडिया

लखनऊ।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव का बिगुल भले औपचारिक रूप से न बजा हो, लेकिन राजनीतिक जमीन पर तैयारियां जोरों पर हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही मिशन 2027 को लेकर अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं। सियासी पटल पर पुराने घाव फिर से कुरेदे जा रहे हैं और नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है।

सबसे ज्यादा सुर्खियों में समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव हैं, जिन्होंने ‘टोटी चोरी’ कांड को एक बार फिर बड़ा मुद्दा बनाकर बीजेपी सरकार पर करारा हमला बोला है। अखिलेश का कहना है कि यह मामला उनके लिए केवल अपमान नहीं बल्कि एक राजनीतिक साजिश का प्रतीक है। उन्होंने साफ शब्दों में चेतावनी दी— “बीजेपी सरकार को समझ लेना चाहिए कि हम इसे भूलने वाले नहीं हैं।”

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस मुद्दे को हल्के में लेने के बजाय सपा की रणनीति को समझने में जुटी है। जानकार मानते हैं कि सपा इस ‘अपमान’ को जनता की सहानुभूति और कार्यकर्ताओं के जोश में बदलने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा इसे ‘फिजूल की राजनीति’ करार देकर विकास और हिंदुत्व एजेंडे पर जनता का ध्यान केंद्रित करना चाहती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अखिलेश यादव की रणनीति दरअसल दोहरी है—एक तरफ वह शिक्षा, बेरोजगारी और किसानों की समस्याओं जैसे मुद्दे उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ‘टोटी चोरी’ और ‘वोट चोरी’ जैसे प्रतीकात्मक आरोपों के जरिए जनता के बीच भाजपा की छवि पर चोट कर रहे हैं।

बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके करीबी नेताओं ने अब तक सीधा जवाब देने से परहेज किया है, लेकिन संगठन के कई नेता इसे सपा की “पुरानी राजनीति का राग” बता रहे हैं। वहीं भाजपा का पूरा जोर 2027 तक कानून-व्यवस्था, महिला सुरक्षा और निवेश जैसे मुद्दों पर अपनी पकड़ मजबूत करने पर है।

वहीं बसपा और कांग्रेस भी इस खींचतान का फायदा उठाने की फिराक में हैं। मायावती पहले ही अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी हैं और दलित वोटबैंक पर पकड़ मजबूत करने की कवायद में हैं। कांग्रेस, प्रियंका गांधी की सक्रियता और युवा नेताओं के सहारे “तीसरा विकल्प” बनने का सपना देख रही है।

सियासी हलकों का मानना है कि मिशन 2027 अब सिर्फ सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं, बल्कि राजनीतिक सम्मान और अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। अखिलेश यादव ‘व्यक्तिगत अपमान’ को चुनावी मुद्दा बना रहे हैं, जबकि भाजपा अपनी छवि को ‘विकास और स्थिर शासन’ की ढाल से बचाने की कोशिश कर रही है।

यूपी की जनता अब बारीकी से देख रही है कि यह लड़ाई किस करवट बैठेगी। फिलहाल इतना तय है कि “टोटी चोरी से वोट चोरी” तक के आरोप आने वाले महीनों में सियासी खींचतान को और तीखा करेंगे।

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