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शुरुआत में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी चुनावी रैलियों में दिखे, गठबंधन के विजन की बात की लेकिन जैसे-जैसे चुनावी माहौल गरमाया, कांग्रेस का राष्ट्रीय चेहरा पीछे हट गया
स्वराज इंडिया न्यूज ब्यूरो
पटना। बिहार विधानसभा चुनाव अपने निर्णायक दौर में है, लेकिन इस बार सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यह बन गया है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर गांधी परिवार मंच से गायब क्यों है? शुरुआत में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी चुनावी रैलियों में दिखे, गठबंधन के विजन की बात की, लेकिन जैसे-जैसे चुनावी माहौल गरमाया, कांग्रेस का राष्ट्रीय चेहरा पीछे हट गया।
गांधी परिवार की यह “रणनीतिक चुप्पी” कई सवाल खड़े करती है, पर इसके भीतर छिपे सियासी संकेत भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय कर सकते हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी और कांग्रेस की यह दूरी महज चुनावी परहेज नहीं, बल्कि रणनीतिक योजना का हिस्सा है। बिहार में महागठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस पहले ही असंतुष्ट रही। लगभग 55-60 सीटों पर चुनाव लड़ रही कांग्रेस को इस बार न तो उम्मीद के मुताबिक सीटें मिलीं, न ही प्रचार में नेतृत्व की पूरी भूमिका।
राहुल गांधी जानते हैं कि अगर बिहार में हार होती है, तो उसका ठीकरा उनके सिर फूटेगा। इसलिए पार्टी ने चुनाव को “राज्यीय चेहरे” यानी तेजस्वी यादव के नेतृत्व तक सीमित रखने का निर्णय लिया। इससे कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर संभावित हार की जिम्मेदारी से खुद को अलग रख सकेगी।
राहुल गांधी ने हाल के वर्षों में राजनीति में अपनी भूमिका को “नेशनल इश्यूज” तक सीमित रखा है। संविधान, लोकतंत्र, बेरोजगारी और महंगाई जैसे विषयों पर। बिहार में अगर वे सक्रिय रूप से प्रचार करते, तो भाजपा चुनाव को “मोदी बनाम राहुल” में बदल देती। इससे बिहार के स्थानीय मुद्दे पीछे छूट जाते और एनडीए को एक मजबूत नैरेटिव मिल जाता।
ऐसे में राहुल गांधी का “मौन प्रचार” दरअसल एक नई राजनीतिक सोच का हिस्सा भी है,जहां वे खुद को क्षेत्रीय पराजयों से बचाकर 2027 और 2029 की बड़ी लड़ाई के लिए तैयार रखना चाहते हैं।
क्षेत्रीय गठबंधनों की दिशा में कांग्रेस चल रही अपनी चाल
बिहार चुनाव से कांग्रेस के लिए एक संदेश साफ है—राष्ट्रीय राजनीति अब क्षेत्रीय गठबंधनों के बिना संभव नहीं। राहुल गांधी का यह फैसला कि वे राज्यीय चेहरों को आगे करें, भविष्य की राजनीति में पार्टी के ढांचे को नया आकार दे सकता है। तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, केसीआर, हेमंत सोरेन जैसे नेताओं के साथ कांग्रेस का समीकरण भविष्य में “संघीय विपक्ष” की दिशा तय कर सकता है।
हालांकि, गांधी परिवार की गैर-मौजूदगी से कांग्रेस प्रत्याशियों का मनोबल कमजोर हुआ है। कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि राहुल या प्रियंका के आने से रैलियों में ऊर्जा और मीडिया कवरेज दोनों बढ़ेंगे। अब जबकि प्रचार का फोकस पूरी तरह तेजस्वी यादव पर केंद्रित है, कांग्रेस का जमीनी नेटवर्क कमजोर दिख रहा है। लेकिन पार्टी का मानना है कि यह एक “दीर्घकालिक पुनर्गठन” का हिस्सा है,जहां क्षेत्रीय नेतृत्व को जिम्मेदारी देकर संगठन को नीचे से मजबूत किया जाएगा।
आगे की राह: लोकसभा 2029 की तैयारी
बिहार में कांग्रेस भले ही सीटों की संख्या के लिहाज से सीमित हो, लेकिन इस चुनाव के बाद पार्टी की रणनीति स्पष्ट हो रही है। राहुल गांधी अब हर चुनाव को “राष्ट्रीय इमेज बिल्डिंग” के नजरिए से देख रहे हैं।
अगर बिहार में महागठबंधन को झटका लगता है, तो कांग्रेस हार से दूरी बनाकर खुद को “संघर्षरत लेकिन अपराजित” पार्टी के रूप में पेश कर सकेगी। और अगर उम्मीद से बेहतर नतीजे आते हैं, तो इसका श्रेय कांग्रेस गठबंधन के हिस्से के रूप में सहज ही ले सकेगी।
बिहार चुनाव राहुल गांधी के लिए केवल एक राज्यीय चुनाव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय छवि प्रबंधन की प्रयोगशाला बन गया है। गांधी परिवार की यह दूरी असल में सियासी दूरी नहीं, बल्कि “रणनीतिक मौन” है—जहां वे हार से बचते हुए भविष्य के गठबंधन की जमीन तैयार कर रहे हैं।
बिहार की जनता चाहे जो फैसला करे, लेकिन इस चुनाव ने कांग्रेस की राजनीति को एक नया मोड़ जरूर दिया है,जहां हार से पहले हार मानने के बजाय, गांधी परिवार लंबी लड़ाई की तैयारी करता दिख रहा है।


