पार्टी के भीतर से ही कई नेताओं का कहना है कि यादव परिवार ने कभी किसी अन्य पिछड़े, दलित या अल्पसंख्यक नेता को इन पदों तक पहुंचने का मौका नहीं दिया
स्वराज इंडिया न्यूज ब्यूरो
लखनऊ।
समाजवादी पार्टी (सपा) के भीतर इस समय पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक (पीडीए) समीकरण को लेकर गहरी कलह दिखाई दे रही है। वजह साफ है—पार्टी के शीर्ष पदों पर परिवारवाद का दबदबा। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर मुख्यमंत्री और लोकसभा में पार्टी नेता तक की कुर्सियां अपने परिवार के भीतर ही सीमित कर रखी हैं। यही परंपरा उनके पिता मुलायम सिंह यादव के दौर से चली आ रही है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या सपा सिर्फ एक परिवार तक सिमटकर रह गई है और पीडीए के नाम पर अन्य बिरादरियों को छल रही है? सपा में अब तक सिर्फ मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद भी हमेशा इसी परिवार के पास रहा। पार्टी के भीतर से ही कई नेताओं का कहना है कि यादव परिवार ने कभी किसी अन्य पिछड़े, दलित या अल्पसंख्यक नेता को इन पदों तक पहुंचने का मौका नहीं दिया। हाल ही में पार्टी से बाहर की गई विधायक पूजा पाल ने भी यही आरोप लगाया कि सपा में परिवारवाद हावी है और पीडीए महज छलावा है।
2023-24 में पीडीए की घोषणा के बाद पार्टी में दरारें साफ दिखने लगीं।
- स्वामी प्रसाद मौर्य ने फरवरी 2024 में सपा छोड़कर अपनी पार्टी बनाई और आरोप लगाया कि सपा में सिर्फ यादव और मुस्लिमों को तरजीह मिलती है, जबकि बाकी समाज को टिकट या पद नहीं मिलते।
- ओम प्रकाश राजभर ने भी अखिलेश पर हमला करते हुए कहा कि वे पीडीए के नाम पर पिछड़े समाज को धोखा देते हैं और सिर्फ इस्तेमाल करते हैं।
- दलित नेताओं ने भी नाराजगी जताई। पूर्व सांसद रामजी लाल सुमन ने आरोप लगाया कि अखिलेश ने दलित छात्रों की छात्रवृत्ति रोककर और समाज को नजरअंदाज कर दिया।
अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप
सपा पर अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुस्लिम समुदाय को तुष्ट करने का भी आरोप लगता रहा है। मुलायम सिंह यादव के समय थानों में मुस्लिम अधिकारियों की नियुक्ति और अखिलेश यादव की योजनाओं को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं। विपक्ष का कहना है कि दंगों और अपराधों में आरोपित नेताओं को पार्टी बचाती है, जबकि पीड़ितों की अनदेखी की जाती है।
अंदरूनी कलह और भविष्य की चुनौती
पार्टी से लगातार बड़े नेता किनारा कर रहे हैं। अपर्णा यादव तक ने 2022 में बीजेपी का दामन थाम लिया और सपा में महिलाओं व गैर-यादव नेताओं की अनदेखी का आरोप लगाया। ईडी की हालिया छापेमारी में सपा से जुड़े कारोबारी से करोड़ों रुपये बरामद होने से भी पार्टी की छवि धूमिल हुई है। कुल मिलाकर, सपा के भीतर परिवारवाद और जातिवाद को लेकर उठते सवाल पार्टी के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। पीडीए के नाम पर अखिलेश यादव की राजनीति फिलहाल विरोधियों और बागी नेताओं को यह कहने का मौका दे रही है कि यह महज चुनावी जुमला है। अगर असंतोष यूं ही जारी रहा, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।