
स्वराज इंडिया ब्यूरो
भारत अक्टूबर में ऐसा बड़ा सैन्य अभ्यास करने जा रहा है, जो भविष्य के युद्ध के स्वरूप को परखने और समझने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। यह अभ्यास ड्रोन और काउंटर-ड्रोन तकनीकों पर केंद्रित होगा। रक्षा सूत्रों के अनुसार यह ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद का सबसे बड़ा अभ्यास है और इसे भारतीय सेना ने ‘कोल्ड स्टार्ट’ सिद्धांत की तर्ज पर तैयार किया है।
अभ्यास की अहमियत
आज की जंग केवल टैंकों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रही। यूक्रेन युद्ध ने साबित किया है कि छोटे ड्रोन भी बड़े-बड़े टैंकों और एयर डिफेंस सिस्टम को ध्वस्त कर सकते हैं। ऐसे में भारत ने यह समझ लिया है कि यदि भविष्य की लड़ाई में बढ़त चाहिए तो ड्रोन और काउंटर-ड्रोन तकनीक पर महारत हासिल करना अनिवार्य है।
क्या होगा अभ्यास में
सेना, वायुसेना और सीमा सुरक्षा बल (BSF) मिलकर इस अभ्यास में हिस्सा लेंगे।
स्वदेशी ड्रोन जैमर सिस्टम का परीक्षण होगा, जो तीन किलोमीटर तक दुश्मन ड्रोन को निष्क्रिय कर सकता है।
निगरानी ड्रोन, लड़ाकू ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरणों का उपयोग होगा।
कठिन मौसम और रात-दिन दोनों परिस्थितियों में अभियानों का अभ्यास किया जाएगा।

रणनीतिक संदेश
यह अभ्यास केवल तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि सामरिक संदेश भी है। भारत यह दिखाना चाहता है कि वह आधुनिक युद्ध की किसी भी चुनौती के लिए तैयार है। यह पड़ोसी देशों को चेतावनी भी होगी कि भारतीय सीमाओं पर ड्रोन के जरिये की जाने वाली कोई भी हरकत अब सुरक्षित नहीं रहेगी।
संभावित चुनौतियाँ
हालांकि इस तरह के अभ्यास आसान नहीं होते।
हाई-टेक उपकरणों का संचालन और समन्वय चुनौतीपूर्ण होगा।
नागरिक इलाकों के पास ड्रोन जैमर से संचार व्यवस्था प्रभावित होने का खतरा रहेगा।
इसके अलावा, पड़ोसी देशों की प्रतिक्रिया पर भी नज़र रखनी होगी, क्योंकि इस तरह के अभ्यास कूटनीतिक हलचल पैदा कर सकते हैं।
विश्लेषण
भारत का यह कदम स्पष्ट संकेत है कि सेना भविष्य की लड़ाई के लिए खुद को तैयार कर रही है। यह अभ्यास आत्मनिर्भर भारत के रक्षा उत्पादन प्रयासों को भी मजबूती देगा, क्योंकि इसमें स्वदेशी तकनीक की बड़ी भूमिका होगी। सबसे अहम बात यह है कि यह अभ्यास केवल ‘प्रदर्शन’ नहीं बल्कि वास्तविक युद्ध परिदृश्य की रिहर्सल है।


