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स्वराज इंडिया न्यूज ब्यूरो, वृंदावन।
वृंदावन के लोकप्रिय संत और राधा रानी के परम भक्त प्रेमानंद महाराज जी इन दिनों संत समाज और मीडिया जगत में चर्चा के केंद्र बने हुए हैं। देशभर में लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र माने जाने वाले महाराज जी को लेकर संत समाज में मतभेद अब खुलकर सामने आ रहे हैं। दरअसल, हाल ही में एक टीवी चर्चा के दौरान एंकर शुभांकर मिश्रा ने कहा कि “कई लोग प्रेमानंद जी को चमत्कार बताते हैं।” इस पर जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा – “ये कोई चमत्कार नहीं है। यदि चमत्कार है तो प्रेमानंद जी मेरे सामने एक अक्षर संस्कृत बोलकर दिखा दें।”
रामभद्राचार्य का यह बयान सीधे तौर पर प्रेमानंद महाराज की आध्यात्मिक लोकप्रियता को चुनौती देने जैसा माना जा रहा है। वहीं, खान सर ने भी हाल ही में प्रेमानंद महाराज के स्वास्थ्य को लेकर कहा था कि “वे भगवान का रूप हैं, क्योंकि बिना किडनी के भी जीवन संभव है।”


विवाद के मूल में क्या है?
रामभद्राचार्य ने शुभांकर मिश्रा के पॉडकास्ट में प्रेमानंद महाराज के आध्यात्मिक और शैक्षणिक ज्ञान पर सवाल उठाते हुए उन्हें “विद्वान या चमत्कारी नहीं, बल्कि एक बालक” बताया। साथ ही खुली चुनौती दी कि यदि उनमें सच में कोई शक्ति है तो वे संस्कृत का कोई श्लोक उच्चारित कर उसका अर्थ बताएं। इसके जवाब में कई संतों और महामंडलेश्वर ने रामभद्राचार्य को भी शास्त्रार्थ और श्लोक व्याख्या के लिए सार्वजनिक मंच पर चुनौती दे डाली। इस बयानबाजी के चलते मामला और गरमा गया है।
संत समाज में बढ़ी खींचतान
अब यह विवाद सिर्फ व्यक्तिगत मतभेद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संत समाज में योग्यता, ज्ञान और चमत्कार के दावों की परख का विषय बन गया है। एक ओर प्रेमानंद महाराज के समर्थक उन्हें दिव्य शक्ति का स्वरूप मानते हैं, वहीं दूसरी ओर रामभद्राचार्य का मानना है कि आस्था और चमत्कार का प्रमाण शास्त्रार्थ और विद्वत्ता से ही होना चाहिए।

संतों महंतों को लेकर मीडिया की भूमिका क्या होनी चाहिए?
विशेषज्ञों का कहना है कि यह विवाद कहीं न कहीं संत समाज में आपसी प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या को भी उजागर करता है, जिसका फायदा मीडिया बखूबी उठा रही है। बहसें, पॉडकास्ट और टीवी डिबेट्स अब इस धार्मिक मतभेद को और सुर्खियों में ला रहे हैं।
आस्था, विद्वत्ता और चमत्कार के बीच चल रही यह खींचतान आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। अब देखना होगा कि संत समाज इस विवाद को संवाद और शास्त्रार्थ से सुलझाता है या यह मुद्दा भक्तों की आस्था को और गहराई तक प्रभावित करेगा।
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