
एक गोपनीय सर्वे में खुलासा, पार्षद जनता से कट हुए हैं स्थानीय मुद्दों पर काम नहीं कर रहे हैं
स्वराज इंडिया न्यूज ब्यूरो
लखनऊ।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों भाजपा पार्षदों की कार्यशैली सवालों के घेरे में है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विकास और सुशासन के एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर पार्टी के कई पार्षद उनकी मेहनत पर पानी फेरते दिखाई दे रहे हैं। न जनता की सुनवाई हो रही है और न ही विकास कार्य गति पकड़ पा रहे हैं। नतीजा यह है कि जनता का गुस्सा सीधे सरकार पर फूट रहा है और विपक्ष को सत्तारूढ़ दल पर हमला करने का मौका मिल रहा है।
जनता से कटे पार्षद, बस कमीशन में सक्रिय
शिकायत है कि अधिकांश पार्षद अपने क्षेत्रों में न तो दिखाई देते हैं और न ही समस्याओं के समाधान के लिए कोई पहल करते हैं। बैठकों और कार्यालयों से उनकी गैरहाज़िरी आम बात हो गई है, लेकिन जैसे ही टेंडर पास कराने या कमीशन लेने का मामला आता है, वे सबसे आगे नजर आते हैं।
लखनऊ के आलमबाग इलाके में चार महीने से सड़क और नाली की मरम्मत रुकी हुई है, लेकिन पार्षद न तो मौके पर पहुंचे और न ही अफसरों पर दबाव बना पाए। कानपुर के हर्ष नगर वार्ड में जलभराव की समस्या लंबे समय से है, परंतु पार्षद बार-बार निवेदन के बावजूद फील्ड में नहीं उतरे। बलिया, गोरखपुर, वाराणसी, प्रयागराज, मेरठ और अयोध्या से भी ऐसी ही शिकायतें आ रही हैं।
शिकायतें और भ्रष्टाचार के आरोप
कुछ जगह तो स्थिति इतनी खराब है कि लोग आरटीआई के जरिए पार्षदों के कामकाज की जांच करा रहे हैं। मुरादाबाद नगर निगम में एक पार्षद पर ठेकेदार से खुलेआम कमीशन मांगने का आरोप लगा। कानपुर ग्रामीण में एक पार्षद ने हैंडपंप लगवाने के नाम पर हजारों रुपये वसूले, लेकिन हैंडपंप आज तक नहीं लगा। इन घटनाओं से जनता में यह धारणा मजबूत हो रही है कि पार्षद जनसेवा नहीं, बल्कि निजी लाभ के लिए चुने जाते हैं।
विपक्ष के निशाने पर भाजपा, 2027 की राह कठिन
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस भाजपा पर सीधा हमला बोल रही हैं। विपक्ष का आरोप है कि भाजपा ने अक्षम और भ्रष्ट पार्षदों को टिकट देकर जनता को धोखा दिया। सवाल यह उठ रहा है कि जब जमीनी स्तर पर ही प्रतिनिधि काम नहीं करेंगे तो विकास की योजनाएं धरातल पर कैसे उतरेंगी?
भाजपा के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है। 2027 विधानसभा चुनावों की राह में स्थानीय निकायों की अहम भूमिका होती है। जनता का बढ़ता असंतोष सीधे पार्टी की वोटबैंक पर असर डाल सकता है। सूत्रों का कहना है कि संगठन स्तर पर पार्षदों की रिपोर्ट मांगी जा रही है और कई जगह चेतावनी भी दी गई है, लेकिन जनता अब केवल चेतावनी से संतुष्ट होने वाली नहीं है।
जनता चाहती है ठोस काम
जनप्रतिनिधियों से जनता की अपेक्षा होती है कि वे समस्याओं के समय सबसे पहले साथ खड़े हों। लेकिन जब वही पार्षद जनता की तकलीफों से मुंह मोड़ते हैं, तो शासन-प्रशासन पर से भरोसा उठना स्वाभाविक है।
योगी सरकार कानून-व्यवस्था और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर जोर दे रही है, लेकिन स्थानीय स्तर पर फैल रही भ्रष्टाचार और उदासीनता की लहर उसके प्रयासों को कमजोर कर रही है। अब सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती सड़क-बिजली-पानी नहीं, बल्कि अपने ही नाकारा पार्षदों की कार्यशैली सुधारना है। क्योंकि यही वे चेहरे हैं जो सीधे जनता और सरकार के बीच की कड़ी हैं। यदि यह कड़ी कमजोर रही, तो भाजपा का गढ़ भी दरक सकता है।



