
( राजनीतिक समीक्षा)
स्वराज इंडिया न्यूज ब्यूरो
पटना/लखनऊ।
बिहार की राजनीति में सत्ता-समीकरण हमेशा से बेहद संवेदनशील और जटिल रहे हैं। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने विधानसभा चुनावों में नंबर वन पार्टी बनकर भी मुख्यमंत्री पद जनता दल (यूनाइटेड) के नेता नीतीश कुमार को देने का फैसला किया, तो यह केवल गठबंधन धर्म का पालन भर नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी दूरगामी रणनीति का हिस्सा है। बिहार में बीजेपी नेतृत्व का यह निर्णय बताता है कि पार्टी आने वाले वर्षों में किसी भी प्रकार के राजनीतिक प्रयोग से बचना चाहती है और स्थिर, भरोसेमंद शासन के मॉडल को आगे बढ़ाना चाहती है।
बीजेपी का यह निर्णय कि वह नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखेगी, पुरानी टीम को दोहराएगी और कोई बड़ा बदलाव नहीं करेगी, केवल गठबंधन राजनीति का हिस्सा नहीं है—यह 2029 की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई की तैयारी है। बिहार में स्थिरता पार्टी की सबसे अहम जरूरत है, क्योंकि अस्थिरता सीधे उसके राष्ट्रीय लक्ष्य को प्रभावित कर सकती है।
अगर यह फॉर्मूला अगले चार वर्षों तक बिना टूट-फूट के चलता है, तो 2029 में बिहार से बीजेपी के लिए मजबूत परिणाम लगभग सुनिश्चित माने जा सकते हैं। चरणबद्ध तरीके से बनाई गई यह रणनीति बताती है कि पार्टी अभी नहीं, आने वाले समय में बड़ा खेल खेलने की तैयारी कर रही है—और बिहार उसकी राजनीतिक बिसात का केंद्रीय हिस्सा बना हुआ है।
केंद्र में मजबूत सत्ता और राज्यों में संगठन के विस्तार पर ध्यान दे रही बीजेपी बिहार में किसी भी बड़े बदलाव को जोखिम मानती है। प्रदेश की सामाजिक संरचना, जातीय समीकरण और राजनीतिक परंपरा ऐसे हैं कि किसी भी प्रयोग का असर सीधे सत्ता गठबंधन की स्थिरता पर पड़ सकता है। इसलिए न सिर्फ मुख्यमंत्री पद पर नीतीश कुमार को बरकरार रखा गया, बल्कि दोनों पुराने उपमुख्यमंत्रियों के साथ टीम को जस का तस रखने का संकेत भी मिला है।
बीजेपी नेतृत्व का मानना है कि पिछली सरकार में यह संतुलन सफल रहा था। नीतीश कुमार के साथ दो उपमुख्यमंत्रियों की तिकड़ी ने प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर तालमेल बनाए रखा, जिसे जनता ने भी स्वीकार किया। इसी मॉडल को दोहराकर पार्टी 2029 तक स्थिर शासन का माहौल बनाना चाहती है।
2029: असली लक्ष्य
बीजेपी की आंखें साफ तौर पर आने वाले लोकसभा चुनाव 2029 पर टिकी हैं। 2019 में जहाँ पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया था, वहीं 2024 में सीटों में आई गिरावट ने नेतृत्व को सतर्क कर दिया है। बिहार जैसे बड़े राज्य से 35 या उससे अधिक सीटें जुटाना केंद्र की सत्ता के लिए अनिवार्य माना जा रहा है। यूपी में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच बिहार का योगदान और भी अहम होता जा रहा है। इसलिए बीजेपी उस फॉर्मूले को छेड़ना नहीं चाहती, जो वोटरों के बड़े हिस्से को अपनी ओर आकर्षित करने में मददगार रहा है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को विश्वास है कि नीतीश कुमार की स्वीकृति और उनका जातीय संतुलन साधने का अनुभव बीजेपी के राजनीतिक हितों के लिए फायदेमंद रहेगा।
हालांकि नीतीश कुमार की लोकप्रियता बीते वर्षों में उतार-चढ़ाव से गुज़री है, मगर वे अभी भी बिहार की राजनीति में एक “बैलेंसिंग फेस” माने जाते हैं। जातीय जनगणना, आरक्षण, पिछड़ा वर्ग प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे संवेदनशील हैं। बीजेपी अगर इन्हें सीधे अपने तरीके से छूती, तो विपक्ष ध्रुवीकरण का आरोप लगा सकता था। ऐसे में नीतीश एक राजनीतिक कवच बनकर काम करते हैं, जो संवेदनशील फैसलों को लोकप्रिय स्वीकार्यता दिलवा सकते हैं।
संगठन को स्थिरता, सरकार को गति
बीजेपी का एक बड़ा लक्ष्य बिहार में अपने संगठनात्मक ढांचे को और मजबूत करना भी है। अगर सरकार में अत्यधिक बदलाव किए जाते, तो जिलों और बूथ स्तर तक इसका नकारात्मक संदेश जाता। पार्टी चाहती है कि शीर्ष स्तर पर सब कुछ सहज और स्थिर रहे, ताकि संगठन आने वाले वर्षों में बिहार में अपने स्वतंत्र वोट बैंक को बढ़ाने पर केंद्रित रह सके। स्थिर सरकार और सक्रिय संगठन—दोनों मिलकर 2029 के लिए वह चुनावी मशीनरी खड़ी करेंगे, जिस पर पार्टी भरोसा कर रही है।

स्वतंत्र ताकत बनने की दिशा में कदम
हालांकि बीजेपी फिलहाल जेडीयू के साथ तालमेल में काम कर रही है, पर पार्टी का दीर्घकालिक लक्ष्य बिहार में अपनी राजनीतिक आत्मनिर्भरता बढ़ाना भी है। पिछले एक दशक में बीजेपी बिहार में सहयोगी दल की भूमिका से निकलकर एक मजबूत, आक्रामक और व्यापक संगठन में बदल चुकी है। भविष्य में वह ऐसी स्थिति बनाना चाहती है कि किसी भी राजनीतिक समीकरण में उसकी शर्तें निर्णायक हों, न कि निर्भरता। फिलहाल बीजेपी के लिए नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली स्थिर सरकार ही बेहतर निवेश मानी जा रही है, जिससे पार्टी धीरे-धीरे अपना आधार विस्तार कर सके।


