Saturday, August 30, 2025
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अयोध्याधाम : भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती मां हट्ठी महारानी

भगवती पातलेश्वरी भवानी के रूप में प्रतिष्ठित है मां हट्ठी महारानी

कुँवर समीर शाही/स्वराज इंडिया
अयोध्या। कश्मीर से कन्याकुमारी तक एवं कामरूप से कच्छ तक तमाम ऐसे मान्यता प्राप्त पूज्य स्थल, धर्मस्थल तथा शक्तिपीठ विद्यमान है, जहाँ वर्ष भर मनोकामनाओं की पूर्ति एवं मानसिक शान्ति प्राप्त करने हेतु श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। ऐसे ही स्थानों में एक स्थान उत्तर प्रदेश के नगर फैजाबाद के बीचों-बीच स्थित है, प्रख्यात शक्ति पीठ माता हट्ठी महारानी का मन्दिर। देखने में माता का यह मन्दिर छोटा अवश्य प्रतीत होता है, किन्तु श्रद्धालुओं की अट्टू आस्था का उन्नत शिखर अत्यन्त उच्च है। मान्यता प्रचलित है कि यहाँ माता के दरबार में शीश नवाने वालों का हर समय कतारें बनी रहती है। धीरे-धीरे माता के स्थान की कीर्ति सम्पूर्ण पूर्वी उत्तर प्रदेश भारत में फैल चुकी है।

माता के स्थान के बारे में एक किवदन्ती प्रचलित है कि नगर के ठठरैया मुहल्ले में लगभग एक सौ सत्तर वर्ष पूर्व एक वटवृक्ष के नीचे एक श्रद्धालु कुम्हार प्रतिदिन जलाभिषेक करता था, एक दिन उसने देखा कि जिस स्थान पर वह अभिषिक्त जल गिरता है, वहाँ वट वृक्ष में एक दरार उत्पन्न होने लगी, दिन-प्रतिदिन वह दरार चौड़ी होती गई एवं अन्ततः उसमें एक देवी प्रतिमा का दर्शन होने लगा। कालान्तर में श्रद्धालुओं द्वारा माँ की यह प्रतिमा वहाँ से उठाकर मन्दिर में स्थापित करके माँ हट्ठी महारानी के नाम से पूजन अर्चन होने लगा। स्वतन्त्रंता प्राप्ति के कुछ वर्ष बाद ही पुरातत्व विभाग के लोगों की नजर माँ की मूर्ति पर पड़ी तो उन्होंने उसका सर्वेक्षण करते हुए विश्लेषण किया और उक्त मूर्ति के महाभारत काल के पूर्व का अर्थात् आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व का होने का दावा किया।

वहीं दूसरी तरफ इस प्रतिमा के सम्बन्ध में पौराणिक एवं पुरातात्विक प्रमाण भी अत्यन्त स्पष्ट है। उपरोक्त माता हट्ठी महारानी के मन्दिर की व्यवस्था को देखने वाली माँ हट्ठी महारानी मन्दिर सेवा समिति के प्रवक्ता के अनुसार साठ के दशक में माँ मैहर शक्ति पीठ के महाधिकारी जब किसी कार्यवश फैजाबाद आए और माता के उक्त स्थल की चर्चा सुनी तो वे माँ का दर्शन करने से स्वयं को रोक न सकें, माँ के मन्दिर में आकर उन्होंने दर्शन प्राप्त किया तथा पूजा अर्चना के पश्चात् वे प्रतिमा को आश्चर्य मिश्रित निनिमेष दृष्टि से देखते हुए उन्होंने बताया कि सन्दर्भित प्रतिमा माँ के उस बिम्ब का प्रतिबिम्ब है जब माँ शक्ति के सामने अहिरावन श्रीराम व लक्ष्मण को उनके सम्मुख पाताल में बलि देने हेतु प्रस्तुत करता है और प्रथम बार शीश झुकाने पर ही बजरंग बली उसका वध करते है तत्पश्चात श्रीराम लक्ष्मण को कन्धे पर बिठाकर माता को नमन कर सकने को उद्यत होते है उस क्षण सारा प्रतिबिम्ब माँ के मुकुठ पर अंकित हो जाता है। वही प्रतिमा नगर फैजाबाद में माँ हट्ठी महारानी के रूप में दर्शनीय है। जहाँ एक ओर माता का यह स्थान पौराणिक और पुरातात्विक दृष्टिकोण से अपना विशिष्ट स्थान बनाये हुए है। वहीं दूसरी ओर वह मन्दिर दक्षिण दिशा मुखी और शेर पे सवार माँ, वह भी आशीर्वाद की मुद्रा में होने के कारण माता की यह प्रतिमा तांन्त्रिक विधियों से भी काफी फलदायी मानी जाती है।
इतने पौराणिक एवं पुरातात्विक महत्व के इस स्थान के सेवा समिति के कार्य के अतिरिक्त अन्य किसी समिति अथवा शासन प्रशासन द्वारा किसी भी प्रकार की कोई सहयोग नहीं किया गया है, और न ही मन्दिर की व्यवस्था करने वाली संस्था ‘‘माँ हट्ठी महारानी मंदिर सेवा समिति’’ किसी प्रशासनिक सहयोग अथवा अनुदान की मोहताज ही है।के साथ ही तमाम सामाजिक कार्यों को भी अंजाम देती है, जिसके लिए किसी से कोई चंदा इत्यादि नहीं लिया जाता, केवल समिति के सदस्यों का सहयोग और चढ़ावे से ही सारे कार्य सम्पादित होते हैं। समिति अपने स्तर से छानबीन करके वास्तव में निर्धन बच्चों को शिक्षा एवं गरीब व दलित कन्याओं का विवाह भी कराती है तथा नगर की एक मलिन बस्ती में बिना बोर्ड का एक सिलाई-कढ़ाई प्रशिक्षण केन्द्र निःशुल्क चलाती हैं साथ ही साथ निर्धन एवं आवश्यकता परक लोगों को दवा आदि से भी आर्थिक मदद करती है।

एक बार मैया के कोष से एक-दो बार कैन्सर के मरीज़ों को आर्थिक सहयोग भी दिया गया था जो कि आज पूरी तरह स्वस्थ हो चुकें हैं। इसी क्रम में समिति ने अप्रैल-2006 से हृदय रोगियों के लिए निःशुल्क चिकित्सा एवं परीक्षण के कैम्प प्रत्येक तीसरे माह आयोजित करना शुरू किया जिसमें अब तक लगभग 3500 मरीजों का परीक्षण एवं चिकित्सा पी0जी0आई0, लखनऊ के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ0 निर्मल गुप्ता द्वारा किया जा चुका है उनमें से लगभग 1000 से ज्यादा मरीज पूर्ण रूप से स्वस्थ भी हो चुके है। समिति ने वर्ष 1998 में लगभग 80000 रूपये लगाकर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया उसके पश्चात् 1001 दलित कन्याओं को भोज दिया, जिसमें उन्हें वस्त्र तथा अच्छी दक्षिणा प्रदान की गई। समिति के पास मैया के सैंकड़ों छत्र हैं। जिसमें सवा किलो चाँदी का एक छत्र समिति का है शेष ग्यारह छत्र भक्तों ने चढ़ाये हैं तथा मैया के दस मुकुट हैं, जिसमें दो सोने का है तथा शेष आठ चाँदी के हैं। माँ के दरबार में दोनों नवरात्रि में प्रतिदिन 108 बत्ती की आरती का आयोजन होता हैं जिसमें हजारों श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं और उस समय इतनी भीड़ होती है कि नगर का मुख्य मार्ग चौक रिकाबगंज मार्ग पूरी तरह से जाम हो जाता है। उस समय यातायत व्यवस्था एकल मार्ग के रूप में परिवर्तित कर दी जाती है। प्रत्येक नवरात्रि की सप्तमी की सम्पूर्ण रात्रि में सवा कुन्तल हवन सामग्री से पूर्णाहुति देते हुए रात्रि जागरण किया जाता है। जन्माष्टमी एवं रामनवमी पर्वों पर विशेष झाँकी सजाई जाती है। प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु माता के द्वार पर प्रातः से लेकर देर रात तक माथा टेकने आते रहते हैं।

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