Saturday, February 14, 2026
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अखिलेश की जुबान या रणनीति? – बागेश्वर धाम विवाद ने बढ़ाया सियासी तापमान

स्वराज इंडिया : न्यूज ब्यूरो / लखनऊ


उत्तर प्रदेश की राजनीति इन दिनों एक नए मोड़ पर है, जहां धर्म, जाति और सियासत की तिकड़ी ने फिर से बहस को हवा दे दी है। इस बार केंद्र में हैं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री। एक प्रेस वार्ता में अखिलेश यादव की टिप्पणी से उपजा विवाद अब इतना बढ़ गया है कि इसकी आंच संत समाज, सोशल मीडिया और सियासी गलियारों तक फैल चुकी है। सवाल उठता है – क्या यह सिर्फ जुबान का फिसलना था, या सोची-समझी रणनीति?
रिपोर्ट के अनुसार लखनऊ में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में अखिलेश यादव ने कथावाचकों की कथित ‘बाजारू प्रवृत्ति’ पर तंज कसते हुए कहा कि कुछ कथावाचक 50 लाख रुपये तक लेकर कथा करते हैं, और इसके लिए ‘अंडर टेबल’ भुगतान भी लिया जाता है। उनका इशारा सीधे-सीधे बागेश्वर धाम के बाबा धीरेंद्र शास्त्री की ओर था, जो हाल के वर्षों में सनातन धर्म के प्रचारक और हिंदू एकता के प्रतीक बनकर उभरे हैं।
अखिलेश की यह टिप्पणी राजनीतिक बवंडर का कारण बन गई। बीजेपी ने इसे तुरंत लपकते हुए समाजवादी पार्टी पर सनातन विरोधी होने का आरोप जड़ दिया।


धीरेंद्र शास्त्री का पलटवार – “पहले डीएनए टेस्ट कराओ”:

धीरेंद्र शास्त्री ने भी जवाब देने में देर नहीं की। उन्होंने न केवल अखिलेश के बयान को अपमानजनक करार दिया, बल्कि तीखी प्रतिक्रिया में कहा – “हिंदू होकर तुम्हें हमसे दिक्कत है? तो पहले अपना डीएनए टेस्ट कराओ।” इस बयान ने मानो सोशल मीडिया पर विस्फोट कर दिया, और अखिलेश की नीयत पर सवाल उठने लगे।

राजनीति या रणनीति?

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो अखिलेश यादव का यह बयान यूं ही नहीं आया। समाजवादी पार्टी का ‘पीडीए’ यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक समीकरण पिछले कुछ महीनों से सुर्खियों में है। ऐसे में ब्राह्मण, ठाकुर और अब संतों को निशाने पर लेना एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य बीजेपी की हिंदुत्व राजनीति को काटना है।

अखिलेश यादव के खिलाफ संत समाज भी मैदान में:

बयानबाजी के बाद संत समाज भी पीछे नहीं रहा। कुछ संतों ने अखिलेश के बयान को निंदनीय बताया, जबकि कुछ ने इसे ‘चुनावी स्टंट’ करार दिया। वहीं धीरेंद्र शास्त्री ने स्पष्ट किया कि वे किसी भी राजनीतिक दल के साथ नहीं हैं और उनका उद्देश्य केवल सनातन धर्म की रक्षा है।

बीजेपी और सहयोगी दलों का वार:

बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने अखिलेश यादव पर हमला बोलते हुए कहा, “यह वही नेता हैं जो सत्ता के लिए जातियों को लड़ाने से नहीं चूकते। अब जब साधु-संत भी इनके निशाने पर हैं, तो साफ है कि इन्हें सनातन धर्म से परहेज है।”
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने भी अखिलेश पर ब्राह्मण बनाम यादव की राजनीति करने का आरोप लगाया।

अखिलेश यादव के बयान से सोशल मीडिया पर दो फाड़:

विवाद का असर सोशल मीडिया पर भी साफ नजर आया। जहां एक ओर अखिलेश के समर्थकों ने उन्हें ‘धर्म की आड़ में धंधा’ उजागर करने वाला नेता बताया, वहीं दूसरी ओर धीरेंद्र शास्त्री के समर्थकों ने अखिलेश को ‘हिंदू विरोधी’ करार दिया।
धर्म और राजनीति का यह टकराव उत्तर प्रदेश की सियासत में कोई नई बात नहीं, लेकिन इस बार मामला साधु-संतों तक पहुंच गया है। अखिलेश यादव की बयानबाजी हो या धीरेंद्र शास्त्री का पलटवार – दोनों ने यह जता दिया कि 2024 के बाद 2027 की तैयारी में नेता भी मैदान में हैं और कथा-वाचक भी।
अब देखना यह होगा कि आने वाले चुनावों में जनता किसके ‘बयान’ को सच मानेगी – अखिलेश की बात को या बाबा के जवाब को।

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