विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान में बदलाव के पीछे आर्थिक संकट, बेरोजगारी और महंगाई भी बड़ी वजह हैं, जिसने महिलाओं को मुखर किया

स्वराज इंडिया अख़बार के लिए इंटरनेशनल डेस्क से
तेहरान।
ईरान में इस्लामिक शासन के खिलाफ मुस्लिम महिलाओं का साहसी और खामोश विद्रोह पूरी दुनिया को सोचने पर मजबूर कर रहा है। बिना नारे, बिना हिंसा और बिना किसी संगठनात्मक आह्वान के—सिर्फ सिर से दुपट्टा उतारकर—ईरानी महिलाएं सड़कों पर उतर आई हैं। यह विरोध महसा अमीनी की 2022 में हिरासत में हुई मौत से शुरू हुआ था, जो अब 2025–26 में और तेज़ होता दिख रहा है।
ईरान, जिसे 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद कुरान आधारित शासन का प्रतीक माना जाता है, वहां महिलाओं पर हिजाब अनिवार्य है। नैतिक पुलिस की सख्ती, सार्वजनिक अपमान और गिरफ्तारी लंबे समय से आम बात रही है। लेकिन महसा अमीनी की मौत के बाद लाखों महिलाओं ने दुपट्टा जलाया, बाल काटे और खुलेआम विरोध किया। अब हालिया महीनों में तेहरान सहित कई शहरों में महिलाएं बिना दुपट्टे के घूमती नज़र आ रही हैं—जो सरकार के लिए सबसे बड़ा डर बन गया है।
दिसंबर 2025 में हालात ऐसे बने कि राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान को विवादास्पद हिजाब कानून को अस्थायी रूप से स्थगित करना पड़ा। हालांकि सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के दबाव में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई। प्रदर्शनों में अब तक कम से कम छह महिलाओं की मौत और दर्जनों गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, फिर भी विरोध थमा नहीं है। यह आंदोलन अब नारों से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के साहस से आगे बढ़ रहा है।

अरब दुनिया में बदलाव, दक्षिण एशिया में उलटी धारा
ईरान की यह बगावत सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं है। अरब और मध्य एशिया के कई मुस्लिम बहुल देशों में बुर्का और नकाब के खिलाफ माहौल बन रहा है। सऊदी अरब में महिलाओं को ड्राइविंग, काम और बिना नकाब सार्वजनिक जीवन जीने की आज़ादी मिली है। कजाकिस्तान ने 2025 में सार्वजनिक स्थानों पर बुर्का-नकाब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, वहीं ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान पहले ही चेहरा ढकने वाले कपड़ों पर रोक लगा चुके हैं। कुल मिलाकर दुनिया के 16 से अधिक देशों में बुर्का या नकाब पर कानूनी पाबंदी है।
यूरोप में भी यही रुख दिखता है। स्विट्जरलैंड ने जनमत संग्रह के जरिए चेहरा ढकने पर रोक लगाई, जबकि फ्रांस, बेल्जियम, डेनमार्क, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड और जर्मनी जैसे देशों में जुर्माना और सज़ा का प्रावधान है। दिलचस्प यह है कि बेल्जियम जैसे देशों में बुर्का पहनने वाली महिलाओं की संख्या बेहद कम होने के बावजूद प्रतिबंध लगाया गया—ताकि कट्टरता की जड़ न पनपे।
इसके ठीक उलट तस्वीर दक्षिण एशिया में नज़र आती है। बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत में बुर्का-हिजाब को धार्मिक अधिकार बताकर प्रदर्शन हो रहे हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश में महिलाएं जुलूस निकालकर इसे अनिवार्य बताने की मांग कर रही हैं, जबकि गुप्त सर्वेक्षण बताते हैं कि बड़ी संख्या में महिलाएं इसे सामाजिक दबाव मानती हैं। भारत में कर्नाटक हिजाब विवाद ने इस बहस को और तीखा कर दिया, जहां शिक्षा संस्थानों में यूनिफॉर्म बनाम धार्मिक प्रतीकों का मुद्दा राष्ट्रीय बहस बना।
कट्टरता या राजनीति?
विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान में बदलाव के पीछे आर्थिक संकट, बेरोजगारी और महंगाई भी बड़ी वजह हैं, जिसने महिलाओं को मुखर किया। वहीं दक्षिण एशिया में विदेशी फंडिंग, राजनीतिक ध्रुवीकरण और कट्टर संगठनों का दबाव इस मुद्दे को भड़का रहा है। आंकड़े बताते हैं कि जिन देशों में बुर्का-नकाब पर प्रतिबंध लगे, वहां सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी 20–30 प्रतिशत तक बढ़ी।
ईरानी महिलाओं का यह खामोश विद्रोह इस बात का प्रतीक बन चुका है कि इस्लाम के नाम पर थोपी गई परंपराएं अब सवालों के घेरे में हैं। सवाल यही है—क्या धर्म महिलाओं की आज़ादी से डरता है, या डर राजनीति को है? दुनिया की नजरें अब ईरान पर हैं, क्योंकि यहां उठी यह चुप आवाज़ आने वाले समय में कई देशों की दिशा बदल सकती है।


