
मनरेगा ने मजदूरों को न केवल काम दिया बल्कि आर्थिक सुरक्षा की गारंटी भी दी
प्रमुख संवाददाता स्वराज इंडिया लखनऊ। वक्त बदलता है, सरकारें बदलती हैं, लेकिन कुछ नीतियां ऐसी होती हैं जो लंबे समय तक समाज को दिशा देती हैं। ऐसी ही ऐतिहासिक योजना है महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), जिसने आज अपनी 20 वर्षों की सफल यात्रा पूरी कर ली है।23 अगस्त 2005 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा लागू की गई यह योजना ग्रामीण भारत के लिए नई उम्मीद बनकर आई थी। उस दौर में जहां शहरों में तकनीक धीरे-धीरे पैर पसार रही थी, वहीं गांवों में किसान और भूमिहीन मजदूर आर्थिक संकट से जूझ रहे थे। ऐसे में मनरेगा ने उन्हें न केवल काम दिया बल्कि आर्थिक सुरक्षा की गारंटी भी दी।
क्या है मनरेगा योजना ?
हर ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्य को 100 दिन का गारंटीकृत रोजगार
बेरोज़गारी भत्ता और परिवहन भत्ता (नियमानुसार)
कृषि और ग्रामीण विकास से जुड़े कार्यों में प्राथमिकता
2010 में इस योजना का नाम बदलकर मनरेगा किया गया और इसे दुनिया का सबसे बड़ा कल्याणकारी कार्यक्रम माना गया।
योजना की वर्तमान स्थिति
वित्तीय वर्ष 2024-25 और 2025-26 में केंद्र सरकार ने मनरेगा के लिए 86,000 करोड़ रुपये का अब तक का सबसे बड़ा बजट आवंटन किया है।पिछले वर्षों में यह आवंटन लगातार बढ़ा है—2020-21 में 61,500 करोड़, 2022-23 में 73,000 करोड़। कांग्रेस की मानी जाती है बड़ी उपलब्धिकांग्रेस पार्टी इस योजना को अपनी बड़ी उपलब्धि मानती है। पार्टी का कहना है कि यह केवल एक रोजगार योजना नहीं बल्कि ग्रामीण भारत की जीवनरेखा है। कांग्रेस का यह भी मानना है कि मनरेगा ने न केवल किसानों और मजदूरों को राहत दी बल्कि सरकार की दूसरी पारी बनाने में भी अहम भूमिका निभाई।मनरेगा को वैश्विक स्तर पर भी सराहा गया है। इसकी सफलता ने भारत को ग्रामीण विकास के क्षेत्र में एक मॉडल देश के रूप में स्थापित किया है। 20 वर्षों की यात्रा का संदेशबीस वर्षों में यह योजना साबित कर चुकी है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनहित की सोच साथ हो तो नीतियां लाखों-करोड़ों लोगों की जिंदगी बदल सकती हैं। आज भी मनरेगा गांव-गांव में आर्थिक सुरक्षा और आत्मसम्मान की कहानी लिख रही है।