
कानपुर | 20 अक्टूबर 2026
देशभर में विजयादशमी पर रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां दशहरे के दिन रावण की पूजा-अर्चना की जाती है। शिवाला क्षेत्र के कैलाश मंदिर परिसर में स्थित दशानन मंदिर अपनी इसी अनूठी धार्मिक परंपरा के लिए जाना जाता है।
इस मंदिर की खासियत यह है कि इसके कपाट साल में केवल एक बार विजयादशमी के दिन खोले जाते हैं। इस अवसर पर श्रद्धालु रावण के दर्शन करने और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। स्थानीय परंपरा के अनुसार, मंदिर का निर्माण वर्ष 1868 में कराया गया था। इस लिहाज से 2026 में यह परंपरा करीब 158 वर्ष पुरानी हो चुकी है।
विजयादशमी पर खुले मंदिर के कपाट
मंगलवार, 20 अक्टूबर को दशहरे के अवसर पर दशानन मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। मंदिर में रावण की प्रतिमा का श्रृंगार किया गया और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना संपन्न हुई। धार्मिक परंपरा के अनुसार, प्रतिमा का दूध और पवित्र जल से अभिषेक कर आरती की जाती है।
मंदिर के कपाट खुलने के साथ ही श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचने लगे। दिनभर पूजा-अर्चना के बाद शाम को मंदिर के कपाट फिर बंद कर दिए जाते हैं और अगले विजयादशमी पर्व पर ही खोले जाते हैं।
महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल ने कराया था निर्माण
स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, शिवाला स्थित कैलाश मंदिर परिसर में दशानन मंदिर का निर्माण वर्ष 1868 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल ने कराया था। मंदिर से जुड़ी परंपरा में भगवान शिव के प्रति रावण की भक्ति और उसके विद्वान व्यक्तित्व को विशेष महत्व दिया जाता है।
मंदिर के पुजारी पंडित राम बाजपेयी के अनुसार, विजयादशमी के दिन विशेष पूजा के लिए कपाट खोले जाते हैं। इस दौरान श्रद्धालु पारंपरिक विधि-विधान से रावण की प्रतिमा के दर्शन और आरती में शामिल होते हैं।
रावण को विद्वान और शिवभक्त के रूप में याद करते हैं श्रद्धालु
दशानन मंदिर की धार्मिक परंपरा रावण के व्यक्तित्व के उन पहलुओं पर केंद्रित है, जिनमें उसे वेदों का ज्ञाता, विद्वान और भगवान शिव का परम भक्त माना जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालु केवल उसके पौराणिक चरित्र को ही नहीं, बल्कि उसकी विद्वता और शिवभक्ति से जुड़ी मान्यताओं को भी याद करते हैं।
स्थानीय धार्मिक मान्यता में रावण को शक्ति का प्रहरी भी माना जाता है। मंदिर परिसर में स्थित अन्य धार्मिक स्थलों के साथ इसका जुड़ाव इस परंपरा को विशिष्ट बनाता है।
रावण दहन और रावण पूजन की अलग-अलग परंपराएं
विजयादशमी का पर्व सामान्य रूप से भगवान राम की रावण पर विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। देश के अधिकांश हिस्सों में रावण के पुतले का दहन किया जाता है, जबकि कानपुर का दशानन मंदिर इस दिन रावण की पूजा की परंपरा के कारण अलग पहचान रखता है।
यह मंदिर भारतीय धार्मिक परंपराओं की विविधता का उदाहरण है, जहां एक ही पौराणिक चरित्र को अलग-अलग मान्यताओं और संदर्भों के साथ याद किया जाता है। साल में केवल एक दिन खुलने वाला यह मंदिर हर विजयादशमी पर श्रद्धालुओं और धार्मिक परंपराओं में रुचि रखने वाले लोगों का ध्यान आकर्षित करता है।


