
पूरे देश की सियासत गरमाई, यूजीसी कानून को लेकर जगह-जगह हो रहे प्रदर्शन ,देश के हालातह रहे खराब
स्वराज इंडिया न्यूज ब्यूरो
नई दिल्ली/लखनऊ।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों में लागू किए गए नए नियमों ने न सिर्फ विश्वविद्यालय परिसरों में, बल्कि समाज और राजनीति में भी हलचल मचा दी है। समानता और भेदभाव-निरोधक व्यवस्था के नाम पर लाए गए इन नियमों को लेकर हिन्दू समाज में अगड़े और पिछड़े वर्गों के बीच नई दरार उभर आई है, जिसका सीधा असर सियासत पर भी दिखाई देने लगा है।
यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षा संस्थानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के साथ होने वाले कथित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से नए नियम जारी किए, जो 15 जनवरी से देशभर के सभी मान्यता प्राप्त कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लागू कर दिए गए। इसके तहत हर संस्थान में समान अवसर केंद्र और समता समिति का गठन अनिवार्य किया गया है, जो भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच करेगी।
हालांकि, इन नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों में गहरी नाराज़गी देखी जा रही है। उनका आरोप है कि नियमों में भेदभाव की परिभाषा एकतरफा है, जिसमें केवल आरक्षित वर्गों को पीड़ित मानकर सामान्य वर्ग को संभावित दोषी के रूप में देखा गया है। झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर कोई दंडात्मक प्रावधान न होने से दुरुपयोग की आशंका भी जताई जा रही है।
आलोचकों का कहना है कि भेदभाव रोकने के लिए पहले से ही संवैधानिक और संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद थीं, ऐसे में नए नियमों की आवश्यकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उनका यह भी कहना है कि प्रारंभिक ड्राफ्ट में ओबीसी को शामिल नहीं किया गया था, लेकिन विरोध के बाद उन्हें जोड़ा गया, जिससे सामान्य वर्ग के छात्र पहले से अधिक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। सवर्ण संगठनों का आरोप है कि भाजपा सरकार पिछड़े और दलित वर्गों को साधने के प्रयास में अपने पारंपरिक सवर्ण समर्थकों की अनदेखी कर रही है। कई संगठन इसे हिन्दू समाज को विभाजित करने की साजिश करार दे रहे हैं। सवर्ण आर्मी और राष्ट्रीय हिंदू सनातनी सेना जैसे संगठनों ने खुले तौर पर सरकार और यूजीसी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
वहीं, समाजवादी पार्टी के लिए यह मुद्दा राजनीतिक रूप से लाभकारी साबित होता दिख रहा है। पार्टी के नेता इसे सामाजिक न्याय से जोड़कर पिछड़े और दलित वर्गों को और मजबूती से अपने पक्ष में करने की रणनीति बना सकते हैं। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा को सवर्ण असंतोष से नुकसान की आशंका सताने लगी है।

आंदोलन का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा
लखनऊ के हजरतगंज में राष्ट्रीय हिंदू सनातनी सेना ने बड़ा प्रदर्शन किया और नियमों को “काला कानून” बताते हुए विधानसभा घेराव की चेतावनी दी। जौनपुर, दिल्ली, जयपुर सहित कई शहरों में सवर्ण संगठनों ने ज्ञापन सौंपे और प्रदर्शन किए। सोशल मीडिया पर नियमों की वापसी को लेकर अभियान तेज है।
इसी बीच बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद के बाद अपने पद से इस्तीफा देकर आंदोलन का समर्थन कर सभी को चौंका दिया। वहीं भाजपा युवा मोर्चा के कई पदाधिकारियों के इस्तीफे ने पार्टी की चिंता और बढ़ा दी है।
हालांकि, आंदोलन अब तक शांतिपूर्ण है, लेकिन जिस तरह से सामाजिक तनाव और राजनीतिक बयानबाज़ी बढ़ रही है, उससे हालात और बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है। सुप्रीम कोर्ट में इस नियम के खिलाफ जनहित याचिका भी दाखिल हो चुकी है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो यह विवाद राष्ट्रीय स्तर पर बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है।


