Wednesday, February 4, 2026
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डिप्टी कमिश्नर प्रशांत सिंह के इस्तीफे का ड्रामा, विकलांगता का फर्जीवाड़ा!

सीएम योगी के अपमान की आड़ में बचने की कोशिश?

डिप्टी कमिश्नर प्रशांत सिंह पर सगे भाई के सनसनीखेज आरोप

भाई ने खोली पोल: इस्तीफा नहीं, जांच से भागने की चाल

स्वराज इंडिया न्यूज़ ब्यूरो
अयोध्या।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कथित अपमान की बात कहकर स्टेट जीएसटी विभाग से इस्तीफा देकर सुर्खियों में आए डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह के मामले में अब ऐसा खुलासा हुआ है, जिसने पूरे प्रकरण की दिशा ही बदल दी है। यह खुलासा किसी विरोधी ने नहीं, बल्कि उनके सगे बड़े भाई डॉ. विश्वजीत सिंह ने किया है और आरोप सीधे नौकरी में फर्जीवाड़े, झूठी विकलांगता और जांच से बचने की साजिश तक जा पहुंचते हैं।

डॉ. विश्वजीत सिंह का आरोप है कि प्रशांत सिंह का यह इस्तीफा किसी आत्मसम्मान का नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है—ताकि चल रही जांच और संभावित रिकवरी से बचा जा सके। उनके मुताबिक, प्रशांत सिंह ने नेत्र विकलांगता का फर्जी प्रमाणपत्र बनवाकर सरकारी नौकरी हासिल की। भाई का दावा है कि प्रशांत सिंह ने खुद को 40 प्रतिशत नेत्रहीन दर्शाया, जबकि जिस आंख की बीमारी का हवाला दिया गया है, वह 50 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति में दुनिया भर में नहीं पाई जाती। यही नहीं, आरोप है कि जांच के दौरान प्रशांत सिंह दो बार मेडिकल बोर्ड के सामने पेश ही नहीं हुए, जिससे संदेह और गहराता है। मामला यहीं नहीं रुकता। डॉ. विश्वजीत सिंह ने डेट ऑफ बर्थ में हेरफेर का भी गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि उम्र और विकलांगता—दोनों बिंदुओं पर कागजी खेल कर सरकारी सेवा में प्रवेश पाया गया।


जांच अंतिम चरण में, उसी वक्त ‘आंसुओं वाला इस्तीफा’


सूत्रों के अनुसार, शिकायत के बाद शुरू हुई विभागीय और मेडिकल जांच अब फाइनल स्टेज में है। ठीक उसी समय, आज प्रशांत सिंह ने रोते हुए इस्तीफा देकर खुद को पीड़ित के रूप में पेश करने की कोशिश की और बहस को “सीएम योगी के अपमान” की भावनात्मक दिशा में मोड़ दिया। डॉ. विश्वजीत सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील की है कि “इस्तीफे के नाटक से भ्रमित न हुआ जाए, पूरी जांच को उसके तार्किक अंजाम तक पहुंचाया जाए।”

ऐसे में अगर आरोप सही हैं, तो जिम्मेदार अफसरों पर कब होगी कार्रवाई? अयोध्या से उठा यह मामला अब एक अफसर के इस्तीफे से आगे बढ़कर सिस्टम की साख पर सवाल खड़े कर रहा है। अब निगाहें मुख्यमंत्री कार्यालय और जांच एजेंसियों पर हैं—क्या सच सामने आएगा या फिर आंसुओं की आड़ में फाइलें दफन हो जाएंगी?

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