कानपुर के अखिलेश दुबे प्रकरण में भ्रष्टाचार की चिंगारी अब सुलगने लगी है
SIT जांच में अब तक CO, इंस्पेक्टर, उपनिरीक्षक तक गिरे, मगर बड़े रैंक के अधिकारी अभी भी ‘सुरक्षित घेरे’ में हैं

मुख्य संवाददाता स्वराज इंडिया
कानपुर/लखनऊ। कानपुर में अधिवक्ता अखिलेश दुबे द्वारा रचे गए फर्जी मुकदमों, जमीन कब्जेदारी और अवैध वसूली के जाल की जांच अब एक पुलिस तंत्र के भीतर की संगठित साजिश का रूप ले चुकी है। एसआईटी की पड़ताल में जहां कई पुलिस अधिकारी—उपनिरीक्षक से लेकर क्षेत्राधिकारी (CO) स्तर तक—फंस चुके हैं, वहीं अब यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या जांच की आंच वरिष्ठ IPS अफसरों तक भी पहुंचेगी, या फिर हमेशा की तरह छोटे अफसर ही बलि के बकरे बनेंगे?
सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश दुबे, निवासी साकेत नगर, कानपुर, अपने सहयोगियों के साथ एक सुनियोजित नेटवर्क चला रहा था, जो अधिवक्ताओं और प्रभावशाली संपर्कों के सहारे फर्जी मुकदमे दर्ज कराना, वसूली करना, जमीन कब्जाना और प्रशासनिक दबाव में समझौते कराना जैसे अपराध करता था।
जांच में यह भी सामने आया कि दुबे ने पुलिस और केडीए के कुछ अफसरों से गठजोड़ कर कानपुर में अपनी जड़ें मजबूत की थीं।
यह प्रकरण केवल एक अधिकारी या गिरोह का मामला नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि कानून के रक्षक ही यदि अपराधियों के संरक्षक बन जाएं, तो व्यवस्था कैसे खोखली हो जाती है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या SIT की जांच सचमुच निष्पक्ष रह पाएगी, या फिर इतिहास दोहराया जाएगा और छोटे अफसर ही सज़ा भुगतेंगे जबकि बड़े नाम फिर बच निकलेंगे।
डीएसपी ऋषिकान्त शुक्ला की संपत्ति से खुला ‘पुलिस-गिरोह गठजोड़’ का राज
इस प्रकरण की जांच के दौरान तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक, कानपुर नगर, वर्तमान में मैनपुरी तैनात ऋषिकान्त शुक्ला पर जब निगाह गई, तो पूरा सिस्टम हिल गया।
एसआईटी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि शुक्ला ने अपनी, परिजनों और बेनामी साथियों के नाम पर करीब 100 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति अर्जित की। इनमें आर्यनगर स्थित 11 दुकानें, कई भूखंड, मकान और अवैध निवेश शामिल हैं।
एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा है कि शुक्ला का यह संपत्ति साम्राज्य उनकी वैध आय से कई गुना अधिक है और इसके पीछे अखिलेश दुबे नेटवर्क के साथ गहरी सांठगांठ की संभावना है।
क्या बड़े अफसरों की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी?
जांच के दायरे में अब यह चर्चा तेज है कि अखिलेश दुबे जैसे अपराधियों को इतना साहस और नेटवर्क आखिर किसके संरक्षण में मिला?
क्या कानपुर में लंबे समय तक तैनात रहे वरिष्ठ IPS अधिकारी, जो इन सब घटनाओं से परिचित थे, जानबूझकर मौन रहे?
सूत्रों के अनुसार, कुछ सेवानिवृत्त व वर्तमान में सक्रिय IPS अधिकारियों के नाम भी अनौपचारिक चर्चाओं में आ रहे हैं, जिन्होंने या तो इस पूरे तंत्र को नजरअंदाज किया या अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षण दिया।
एसआईटी की जांच में अब तक कई CO, इंस्पेक्टर, उपनिरीक्षक नपे हैं। मगर हर बार की तरह इस बार भी सवाल यही है —
क्या इस ‘भ्रष्टाचार के शतरंज’ में सिर्फ प्यादे ही कुर्बान होंगे, या राजा-रानी तक भी जांच की आंच पहुंचेगी?
जांच अधिकारियों पर अब यह दबाव है कि वे केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क की परतें उधेड़ें, जिसमें छोटे अफसरों से लेकर उच्च रैंक के अधिकारी तक शामिल रहे हैं।
266 पृष्ठों की जांच फाइल खोली गई
अपर पुलिस महानिदेशक (प्रशासन) उत्तर प्रदेश द्वारा तैयार रिपोर्ट में यह पूरा प्रकरण दर्ज है, जिसे अब प्रमुख सचिव (सतर्कता) के पास भेजा गया है।
रिपोर्ट में 266 पृष्ठों के साथ संपत्ति के अभिलेख, साझेदारों के नाम, और गोपनीय दस्तावेज शामिल हैं। शासन स्तर से स्पष्ट निर्देश है कि सिर्फ कागजी जांच नहीं, बल्कि आरोपियों की वित्तीय और विभागीय जिम्मेदारी तय की जाए।


