पूर्वांचल के छठ महापर्व की भव्य शुरुआत
नदियों और जलाशयों के पास सजावट की धूम

प्रमुख संवाददाता स्वराज इंडिया
कानपुर/वाराणसी/गोरखपुर। पूर्वांचल के घाटों पर एक बार फिर भक्ति और आस्था का अद्भुत संगम दिखाई दे रहा है। सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया है। जैसे ही सूर्य की पहली किरणें धरती पर उतरीं, वैसे ही नदियों, तालाबों और पोखरों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। महिलाएं और पुरुष स्नान कर शुद्ध भोजन ग्रहण करते हुए आने वाले चार दिवसीय पर्व की तैयारी में जुट गए हैं। वातावरण में अब केवल एक ही भाव गूंज रहा है — आस्था, अनुशासन और पवित्रता का।
छठ महापर्व भारतीय संस्कृति की सबसे पवित्र परंपराओं में से एक है। यह पर्व न केवल सूर्य देव और उनकी पत्नी ऊषा की उपासना का माध्यम है, बल्कि यह प्रकृति, संयम और कृतज्ञता का प्रतीक भी है। पूर्वांचल, बिहार, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्रों में यह पर्व जन-जन के जीवन का हिस्सा बन चुका है। गाँव से लेकर शहर तक, हर जगह आज भक्ति का माहौल है।

चार दिनों की तपस्या और भक्ति का उत्सव
छठ पर्व चार दिनों तक अत्यंत अनुशासन, संयम और श्रद्धा से मनाया जाता है।
पहला दिन नहाय-खाय का होता है, जब व्रती शुद्ध स्नान कर लौकी और चने की दाल का प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह शुद्धता और आत्म-संयम की शुरुआत मानी जाती है।
दूसरे दिन खरना होता है, जिसमें व्रती पूरे दिन निर्जल उपवास रखते हैं और शाम को गुड़-चावल की खीर और रोटी का प्रसाद बनाकर ग्रहण करते हैं। इसी क्षण से व्रत का कठिन चरण शुरू होता है।
तीसरे दिन सूर्यास्त के समय व्रती घाटों पर पहुँचकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
और चौथे दिन भोर में उदयाचल सूर्य को अर्घ्य देने के साथ यह पर्व संपन्न होता है।

इन चार दिनों में न केवल धार्मिक भावनाओं का प्रवाह होता है, बल्कि समाज में अनुशासन, स्वच्छता और एकता का अप्रतिम उदाहरण भी देखने को मिलता है। घाटों की सफाई, साज-सज्जा और जलाशयों की पवित्रता बनाए रखने में पूरा समाज जुटा रहता है।
लोकगीतों और दीपों से जगमग हुआ पूर्वांचल
जैसे-जैसे खरना और अर्घ्य का समय नजदीक आता है, वैसे-वैसे घाटों पर रौनक बढ़ने लगती है।
ढोल-मंजीरों की थाप, लोकगीतों की मधुर ध्वनि और टिमटिमाते दीपकों की लौ घाटों को आस्था के दीपमालाओं से सजाते हैं।
महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं —
“केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगंध बसैला…”
ये लोकगीत मातृत्व, प्रेम, कृतज्ञता और पारिवारिक एकता के भावों से ओतप्रोत होते हैं।
बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं — सभी इस अनुष्ठान का हिस्सा बनते हैं। घरों में प्रसाद के रूप में ठेकुआ, केला, नारियल, नींबू और गन्ना सजाए जाते हैं। बांस की टोकरी में सजे ये प्रसाद वस्तुएं समृद्धि और पवित्रता का प्रतीक मानी जाती हैं।
पौराणिक मान्यताएं और ऐतिहासिक प्रसंग
छठ पर्व की उत्पत्ति त्रेतायुग से जुड़ी मानी जाती है।
कहा जाता है कि जब भगवान राम वनवास से लौटे, तब माता सीता ने कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्य देव की आराधना की थी।
एक अन्य कथा के अनुसार महाभारत काल में सूर्यपुत्र कर्ण प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य देकर शक्ति और तेज प्राप्त करते थे।
इसी परंपरा से प्रेरित होकर आज भी लोग डूबते और उगते सूर्य — दोनों की पूजा करते हैं, जो जीवन के चक्र और ऊर्जा के निरंतर प्रवाह का प्रतीक है।

विज्ञान और अध्यात्म का सुंदर संगम
छठ पूजा का वैज्ञानिक पक्ष भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सूर्य को जल अर्पण करते समय व्रती जब जल की सतह पर झुककर किरणों का प्रतिबिंब देखते हैं, तो इससे आंखों की कोशिकाएं सक्रिय होती हैं और शरीर में सूर्य ऊर्जा का संतुलन बनता है।
उपवास और फलाहार शरीर को विषमुक्त करते हैं, जिससे शारीरिक और मानसिक संतुलन प्राप्त होता है। इसीलिए छठ को “आस्था और स्वास्थ्य का पर्व” कहा जाता है।

सामाजिक एकता और समानता की मिसाल
छठ पर्व में न कोई जाति का भेद है, न धर्म का।
गाँवों और शहरों में लोग मिलकर घाट सजाते हैं, प्रसाद बनाते हैं और सामूहिक रूप से पूजा करते हैं।
यह त्योहार सामाजिक समरसता का प्रतीक है — जहां हर व्यक्ति समान भावना से जुड़ा होता है।
पूर्वांचल में प्रशासन और समाज की साझी तैयारी
गोरखपुर, वाराणसी, कानपुर, बलिया, आजमगढ़, और मऊ जैसे जिलों में घाटों की सफाई और सुरक्षा के लिए प्रशासन ने विशेष इंतज़ाम किए हैं।
नगर निगम और स्वयंसेवी संस्थाएँ मिलकर सफाई अभियान चला रही हैं।
सुरक्षा के लिए गोताखोरों और स्वास्थ्य टीमों की तैनाती की गई है ताकि श्रद्धालु निर्भय होकर पूजा कर सकें।
आस्था का चरम: उदयाचल सूर्य को अर्घ्य
पर्व का अंतिम क्षण सबसे भावनात्मक होता है। जब भोर की पहली किरणें जल में उतरती हैं और व्रती दोनों हाथों से अर्घ्य देते हैं, तो पूरे वातावरण में अद्भुत ऊर्जा का संचार होता है।
व्रतियों के चेहरे पर संतोष और कृतज्ञता का भाव झलकता है — यह केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन के प्रति धन्यवाद का पर्व है।
जहां सूर्य केवल देवता नहीं, बल्कि जीवन का प्रत्यक्ष स्रोत हैं।
यह पर्व सिखाता है कि जब हम प्रकृति, अनुशासन और पवित्रता के साथ जुड़ते हैं, तभी जीवन में सच्ची समृद्धि आती है।
घाटों पर जलते दीपों की रौशनी सिर्फ नदियों में नहीं, बल्कि मानव हृदयों में भी उजाला भरती है।


