
असाधारण योग्यता होने के बाद भी इतिहास ने उनके योगदान को भुला दिया
बी.एन. राउ जैसे व्यक्तित्वों को जानना और सम्मान देना भारत की बौद्धिक विरासत को पुनर्स्थापित करने की दिशा में पहला कदम होगा
स्वराज इंडिया न्यूज डेस्क
नई दिल्ली।
भारतीय संविधान की चर्चा होते ही डॉ. भीमराव अंबेडकर का नाम सबसे पहले लिया जाता है। उन्हें संविधान निर्माता कहा गया और वह भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रतीकों में गिने जाते हैं। लेकिन संविधान के निर्माण की वास्तविक प्रक्रिया में एक और नाम था—सर बेनगल नरसिंहम राउ (बी.एन. राउ)—जिन्हें इतिहास और राजनीति ने लगभग अदृश्य कर दिया।
बी.एन. राउ भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) के अधिकारी थे। वे कानून और प्रशासन के गहरे जानकार माने जाते थे। संविधान सभा द्वारा नियुक्त संवैधानिक सलाहकार के रूप में उन्होंने संविधान का प्रारंभिक मसौदा (Draft Constitution) तैयार किया, जिसने बाद में संविधान का स्वरूप गढ़ने में नींव का कार्य किया।
उनकी योग्यता असाधारण थी, लेकिन राउ न तो आंदोलनकारी थे, न करिश्माई नेता और न ही राजनीतिक प्रतीक। यही कारण था कि वे इतिहास के पन्नों में उतने चर्चित नहीं हो पाए। उनकी सादगी और प्रसिद्धि से दूर रहने की प्रवृत्ति ने भी उनकी भूमिका को ओझल कर दिया।
क्यों हुए भुला दिए गए राउ?
प्रश्न यह नहीं है कि अंबेडकर को क्यों प्रमुखता दी गई, बल्कि यह है कि राउ को क्यों भुला दिया गया। क्या यह केवल जातिगत राजनीति का परिणाम था? क्या उनकी ब्राह्मण पहचान के कारण उनके योगदान को राजनीतिक विमर्श से हटा दिया गया?
एक धारणा यह भी है कि नए भारत में दलित प्रतीकों को प्रमुखता देना सामाजिक न्याय का हिस्सा माना गया, और इस प्रक्रिया में राउ जैसे ब्राह्मण बौद्धिक चेहरों को हाशिये पर कर दिया गया।
योगदान जो भुलाए नहीं जा सकते
राउ ने संविधान के प्रत्येक अनुच्छेद पर गहन अध्ययन कर मसौदा तैयार किया।
उन्होंने अमेरिकी, ब्रिटिश और आयरिश संविधान सहित कई देशों की संवैधानिक व्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया और भारतीय संदर्भ में उपयुक्त प्रावधान सुझाए।
संघीय ढांचे, मौलिक अधिकारों और न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे बुनियादी ढांचे को आकार देने में उनकी भूमिका निर्णायक रही।
उन्होंने संविधान सभा को बार-बार सचेत किया कि कोई भी प्रावधान केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से न जोड़ा जाए, बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर तय किया जाए।
स्मृति-प्रबंधन बनाम सच्चा लोकतंत्र
इतिहास के मूल्यांकन में यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या स्मृति-प्रबंधन ने राउ को अदृश्य बना दिया? क्या राजनीतिक सुविधा और तात्कालिक लाभ ने संविधान निर्माण के वास्तविक शिल्पियों को पीछे धकेल दिया?
आज जबकि भारतीय लोकतंत्र एक नई सामाजिक चेतना के साथ आगे बढ़ रहा है, यह आवश्यक है कि संविधान की रचना-प्रक्रिया को केवल एक प्रतीकात्मक कथा न बनाया जाए।
राष्ट्रीय नीति और बौद्धिक विरासत
राउ को पुनर्स्थापित करना किसी जाति या वर्ग को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि इतिहास के साथ ईमानदारी करना है। संविधान केवल अंबेडकर, नेहरू या पटेल का नहीं, बल्कि उन अदृश्य हाथों और मेधावी मस्तिष्कों की सम्मिलित कृति है जिन्होंने इसकी नींव डाली।
बी.एन. राउ जैसे व्यक्तित्वों को जानना और सम्मान देना भारत की बौद्धिक विरासत को पुनर्स्थापित करने की दिशा में पहला कदम होगा। यह भारतीय संविधान की आत्मा और इतिहास, दोनों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
संविधान की आत्मा उसके शब्दों में ही नहीं, बल्कि उसकी रचना प्रक्रिया में भी बसती है। जब तक उस प्रक्रिया के सभी प्रमुख शिल्पियों को उचित पहचान नहीं दी जाएगी, तब तक भारतीय संविधान का इतिहास अधूरा ही रहेगा।


