

- “लव इन वियतनाम” फिल्म में निभाई एसोसिएट प्रोड्यूसर की जिम्मेदारी
- कल 12 सितम्बर को भारत सहित कई देशों के सिनेमा घरों में हो रही रिलीज
- बिल्हौर के प्रभा सनराइज स्कूल से हासिल की प्राथमिक शिक्षा
- वर्ष 2018 में मुंबई के एक कॉलेज से शुरू की फिल्मी दुनियां की पढ़ाई
- केबीसी मंच से अमिताभ बच्चन पढ़ चुके हैं उनकी कुछ लाइनें
- देवांश बोले घरवाले हों साथ तो कुछ भी मुश्किल नहीं
रिज़वान कुरैशी/स्वराज इंडिया
बिल्हौर (कानपुर)। कहते हैं कि मुंबई हर किसी को अपनाती नहीं। यह शहर हज़ारों सपनों को जन्म देता है और उतने ही तोड़ भी देता है। लेकिन जो ठान ले वही इस मायानगरी की भीड़ में सितारे की तरह चमक उठता है। कानपुर के बिल्हौर की गलियों में खेलकूद बढ़ा हुआ देवांश भारद्वाज भी ऐसे ही जिद्दी सपनों वाला एक लड़का है। महज 26 साल की उम्र में उसने वो मुकाम पा लिया है,जहाँ पहुँचना हज़ारों का सपना होता है। फिल्म लव इन वियतनाम,जिसमें देवांश बतौर एसोसिएट प्रोड्यूसर जुड़े हैं,कल 12 सितंबर को भारत सहित कई अलग-अलग देशों में रिलीज़ हो रही है। और यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि इतिहास है-पहली इंडो-वियतनामी फिल्म,जो दिसंबर में चीन के 10 हजार स्क्रीन्स पर भी दिखाई जाएगी। देवांश ने 2018 में मुंबई एजुकेशनल ट्रस्ट से फिल्म की पढ़ाई शुरू की। दो साल तक पढ़ाई और साथ ही काम की शुरुआत की। पहले टीवी सीरियल्स और रियलिटी शोज़ में असिस्टेंट बने। वहीं, अंदर से लेखक हमेशा जागता रहा। कविताएँ और कहानियाँ लिखते रहे। विज्ञापन लिखे और उनकी लिखी कुछ पंक्तियाँ सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने केबीसी के मंच से पढ़ीं। देवांश मानते हैं कि यह पल उनके लिए किसी बड़े अवॉर्ड से कम नहीं था। कॉलेज के दौरान बनाई गई उनकी शॉर्ट फिल्म ने दुनिया भर के कई फिल्म फेस्टिवल्स में पुरस्कार जीते। कोलकाता फिल्म फेस्टिवल में भी बेस्ट फिल्म का अवॉर्ड मिल चुका है। छोटे प्रोजेक्ट्स से शुरुआत करते हुए म्यूजिक वीडियो और एडवरटाइजमेंट बनाए और धीरे-धीरे फिल्मों में प्रोडक्शन शुरू किया। आज वे कई फिल्मों से जुड़े हैं और बतौर एसोसिएट प्रोड्यूसर अपनी पहचान बना चुके हैं। देवांश कहते हैं कि पिता जी और माँ के बिना यह सफ़र संभव नहीं था। उन्होंने हर फैसले में मेरा साथ दिया। जब घरवाले आपके साथ हों, तो लगता है आपके पास किसी भी मुश्किल को पार करने की ताक़त है। उनके दादा स्व0 बालकृष्ण शर्मा, बिल्हौर में लेखपाल रहे। पिता अनिल कुमार शर्मा एलआईसी एजेंट हैं, जबकि माँ श्रीमती लता गृहणी हैं। बड़ी बहन अंशिका पारले में नौकरी करती हैं और भाई ब्रह्मांश दिल्ली में वकालत कर रहे हैं। परिवार का यह साथ ही देवांश की सबसे बड़ी ताक़त बना।

लेखनी और जुनून ने आगे बढ़ाया
देवांश का झुकाव शुरू में पत्रकारिता की ओर था। उन्होंने कई जगहों पर आर्टिकल लिखे, अलग-अलग संस्थाओं के लिए घोस्ट राइटिंग भी की। मीडिया जगत से ऑफ़र भी आए, लेकिन उनका दिल फिल्मों में ही बसता था। उन्होंने मुंबई को चुना क्योंकि सपना स्पष्ट था-फिल्में बनानी हैं,अच्छा लिखना है, और लोगों के दिल को छूने वाली कहानियाँ देनी हैं।

लव इन वियतनाम—एक ऐतिहासिक कदम
देवांश ने बताया कि लव इन वियतनाम फ़िल्म एक म्यूजिकल लव स्टोरी है,जो मशहूर किताब(Madonna in a Fur Coat)पर आधारित है। इसके गाने पहले ही लोकप्रिय हो चुके हैं। लंबे समय बाद बॉलीवुड ऐसी आइकोनिक लव स्टोरी लेकर आ रहा है, जो न सिर्फ दर्शकों को कहानी सुनाएगी बल्कि प्यार को महसूस भी कराएगी। देवांश कहते हैं-ये फिल्म सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, बल्कि एक एहसास है। लोग इसे देखेंगे तो उन्हें प्यार फील होगा।”
भारत में रिलीज़ होने से पहले ही यह फिल्म इतिहास रच चुकी है और अब दुनिया भर में रिलीज़ होकर नई इबारत लिखने जा रही है।
छोटे से कस्बे से सफर शुरू कर पहुंचे मुंबई
देवांश की शुरुआती पढ़ाई बिल्हौर के प्रभा सनराइज स्कूल में हुई। फिर कानपुर के हॉस्टल में रहकर पढ़ाई की। डीपीएस कल्याणपुर से 12 वीं पूरी करने के बाद मुंबई का सफ़र शुरू हुआ। अब उनकी मेहनत और लगन ने उन्हें इंटरनेशनल मंच पर पहुँचा दिया है। आज देवांश की यह उपलब्धि न सिर्फ उनके परिवार बल्कि पूरे बिल्हौर और कानपुर के लिए गौरव की बात है। छोटे कस्बे से उठकर मायानगरी मुंबई तक जाना और फिर दुनिया के सबसे बड़े फिल्म बाज़ार तक पहुँचना, यह हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो सपनों को पाने से डरता है।


