
नई दिल्ली।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन देश के नए उपराष्ट्रपति चुन लिए गए हैं। उन्होंने विपक्ष के साझा प्रत्याशी सुदर्शन रेड्डी को बड़े अंतर से पराजित कर दिया। राधाकृष्णन की इस जीत को केवल एक राजनीतिक सफलता ही नहीं, बल्कि दक्षिण भारत से राष्ट्रीय राजनीति में NDA की पकड़ मजबूत होने के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है।
कौन हैं सीपी राधाकृष्णन
तमिलनाडु से आने वाले सीपी राधाकृष्णन लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जुड़े रहे हैं। वे दो बार कोयंबटूर से सांसद रह चुके हैं और संगठन के स्तर पर दक्षिण भारत में पार्टी को मजबूत करने में उनकी अहम भूमिका रही है। सरल स्वभाव और साफ-सुथरी छवि वाले नेता के रूप में उनकी पहचान है। उपराष्ट्रपति पद पर उनकी नियुक्ति से न केवल NDA का राजनीतिक संतुलन और व्यापक होगा, बल्कि संसद में दक्षिण की आवाज को भी और मजबूती मिलेगी।

विपक्ष की रणनीति क्यों विफल हुई
विपक्ष ने सुदर्शन रेड्डी को उम्मीदवार बनाकर दक्षिण भारत के मतदाताओं को संदेश देने की कोशिश की थी, लेकिन स्पष्ट रणनीति और गठबंधन की कमजोरी के चलते यह दांव सफल नहीं हो पाया। कई क्षेत्रीय दलों ने मतदान में तटस्थता बनाए रखी या NDA के पक्ष में झुक गए। इससे विपक्ष का “एकजुटता का संदेश” फीका पड़ गया।
राजनीतिक संकेत और असर
इस जीत से संसद में NDA का मनोबल और मजबूत होगा।
दक्षिण भारत में BJP की पैठ बढ़ाने की कोशिशों को यह चुनाव एक वैचारिक समर्थन देता है।
विपक्ष के लिए यह हार भविष्य की रणनीति पर पुनर्विचार का संकेत है।
उपराष्ट्रपति होने के नाते राधाकृष्णन राज्यसभा की अध्यक्षता करेंगे, जिससे उनकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण होगी।

निष्कर्ष
सीपी राधाकृष्णन की उपराष्ट्रपति पद पर जीत को NDA ने “जनादेश की पुष्टि” करार दिया है, वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह नतीजा आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों पर असर डालेगा। यह चुनाव केवल एक पद की जीत नहीं है, बल्कि सत्ता और विपक्ष की भावी दिशा तय करने वाला संकेत भी है।


