संतों की संगति से जीवात्मा का कल्याण होता है और मनुष्य दुःखों से मुक्त होकर परमगति प्राप्त करता है।
कानपुर/धर्म डेस्क।
सत्संग की महिमा का वर्णन धर्मशास्त्रों में अनेक बार हुआ है। कहा गया है कि संतों की संगति से जीवात्मा का कल्याण होता है और मनुष्य दुःखों से मुक्त होकर परमगति प्राप्त करता है। हारीत स्मृति में उल्लेख है—
“दानं दमस्तपः शौचमार्जवं क्षान्तिरेव च ।
आनृशंस्यं सतां संगः पारमैकान्त्यहेतवः ॥”
अर्थात दान, तप, शौच, क्षमा और संतों का संग—ये सब परमगति के कारण हैं।
इसी सत्य को प्रमाणित करती है पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड) की वह अद्भुत कथा जिसमें केवल थोड़ी-सी संत संगति से पाँच प्रेतों का उद्धार हो गया।
वन में ब्राह्मण और प्रेतों की भेंट
प्राचीन काल में पृथु नामक एक आचारनिष्ठ ब्राह्मण धर्मकार्य में निरंतर लगे रहते थे। एक बार वे तीर्थयात्रा पर निकले और एक ऐसे वन में पहुँचे जहाँ न वृक्ष थे, न जल। केवल कांटे ही कांटे दिखाई पड़ते थे। वहीं उनकी दृष्टि पाँच भयंकर प्रेतों पर पड़ी। उनकी विकृत आकृति और पीड़ित दशा देखकर पृथु चकित रह गए। उन्होंने साहस करके पूछा—
“तुम कौन हो और किस कर्म के कारण इस दुर्गति को प्राप्त हुए हो?”
प्रेतों ने ब्राह्मण से अपनी कथा कही—
पहला प्रेत बताने लगा कि वह स्वयं ताजा भोजन खा लेता और ब्राह्मणों को बासी भोजन देता। इस पाप से उसका नाम पर्युषित पड़ा। दूसरा प्रेत भूखे ब्राह्मणों की हत्या कर बैठा था। उसे सूचीमुख नाम मिला और उसकी दशा ऐसी हो गई कि मुँह सुई की तरह छोटा हो गया। भोजन-पानी मिलते भी हैं तो वह भरपेट नहीं खा सकता।तीसरा प्रेत हर बार भूखों से बचने के लिए शीघ्र भाग जाता था, इसलिए वह शीघ्रग कहलाया। इस जन्म में वह लँगड़ा होकर भटक रहा था। चौथा प्रेत कभी दान नहीं करता था और घर में बैठकर ही स्वादिष्ट भोजन भोगता रहता था। उसे रोधक कहा गया और अब वह सिर नीचा करके चलने को विवश था। पाँचवाँ प्रेत किसी याचक को उत्तर तक नहीं देता, बस सिर झुकाकर धरती कुरेदता रहता। इस कारण उसका नाम लेखक पड़ा और अंग-प्रत्यंग विकृत हो गए।उन्होंने बताया कि वे केवल अपवित्र घरों में मिलने वाले निंदनीय अन्न पर ही जीवित रहते हैं और क्षण-प्रतिक्षण दुःख भोगते हैं।
ब्राह्मण का उपदेश और धर्म का मार्ग
प्रेतों ने ब्राह्मण से प्रार्थना की—
“हे तपस्वी! हमें बताइए कि कौन-सा मार्ग हमें इस योनि से बचा सकता है?”
तब पृथु ब्राह्मण ने कहा—जो मनुष्य कृच्छ्र या चान्द्रायण व्रत करता है, वह प्रेतयोनि में नहीं पड़ता।जो मान-अपमान और मित्र-शत्रु में समभाव रखता है, वह भी प्रेत नहीं होता। जिसने क्रोध, ईर्ष्या, लोभ और तृष्णा को जीत लिया है, वह इस दुःखद योनि से बचता है।जो दयालु है और गौ, ब्राह्मण, तीर्थ, पर्वत, नदी एवं देवताओं को प्रणाम करता है, वह कभी प्रेतयोनि को प्राप्त नहीं होता।
सत्संग का फल : प्रेतों का उद्धार
ज्यों ही ब्राह्मण ने यह उपदेश दिया, आकाश में नगाड़े बज उठे। चारों ओर पुष्पवृष्टि होने लगी और दिव्य विमान प्रकट हो गए।
आकाशवाणी हुई—
“संत के साथ थोड़ी-सी वार्ता मात्र से ही तुम्हारा उद्धार हो गया।” क्षणभर में वे पाँचों प्रेत अपने दुःखों से मुक्त होकर दिव्य विमानों में बैठ स्वर्गलोक के लिए प्रस्थान कर गए।
यह कथा स्पष्ट करती है कि सत्संग का प्रभाव जीवन को ही नहीं, मृत्यु के बाद की गति को भी बदल सकता है। थोड़ी देर का संत संग भी जीवात्मा को पापों से मुक्त कर दिव्य मार्ग पर अग्रसर कर देता है।🙏 ॐ नमो नारायणाय | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏